बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 712, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें७०२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३
| तस्मात्सोऽस्ति कार्यकारणसङ्घात-<br>विलक्षणः, यश्चेष्टयति ॥ १ ॥ | जो इससे चेष्टा करता है, वह<br>कार्यकारणसंघातसे विलक्षण [ तेरा<br>सर्वान्तर आत्मा ] है ॥ १ ॥ |
आत्माकी अनिर्वचनीयता
स होवाचोषस्तश्चाक्रायणो यथा विब्रूयाद्सौ गौर-
सावश्व इत्येवमेवैतद् व्यपदिष्टं भवति यदेव साक्षाद-
परोक्षाद्ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरस्तं मे व्याचक्ष्वेत्येष त
आत्मा सर्वान्तरः कतमो याज्ञवल्क्य सर्वान्तरः । न
दृष्टेर्द्रष्टारं पश्येर्न श्रुतेः श्रोतारं शृणुया न मतेर्मन्तारं
मन्वीथा न विज्ञातेर्विज्ञातारं विजानीयाः । एष त
आत्मा सर्वान्तरोऽतोऽन्यदार्तं ततो होपस्तश्चाक्रायण
उपरराम ॥ २ ॥
उस चाक्रायण उषस्तने कहा, 'जिस प्रकार कोई [चलना और दौड़ना दिखाकर] कहे कि यह (चलनेवाला) बैल है, यह (दौड़नेवाला) घोड़ा है, उसी प्रकार तुम्हारा यह कथन है; अतः जो भी साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म और सर्वान्तर आत्मा है, उसे तुम स्पष्टतया बतलाओ।' [याज्ञवल्क्य—] 'यह तेरा आत्मा सर्वान्तर है।' [उषस्त] 'हे याज्ञवल्क्य ! वह सर्वान्तर कौन सा है?' [याज्ञवल्क्य—] 'तुम दृष्टिके द्रष्टाको नहीं देख सकते, श्रुतिके श्रोताको नहीं सुन सकते, मतिके मन्ताका मनन नहीं कर सकते, विज्ञाति-के विज्ञाताको नहीं जान सकते। तुम्हारा यह आत्मा सर्वान्तर है, इससे भिन्न आर्तं (नाशवान्) है।' इसके पश्चात् चाक्रायण उषस्त चुप हो गया ॥ २ ॥
| स होवाचोषस्तश्चाक्रायणः—<br><br>यथा कश्चिदन्यथा प्रतिज्ञाय पूर्वम्,<br><br>पुनर्विप्रतिपन्नो ब्रूयादन्यथा— | उस चाक्रायण उषस्तने कहा, 'जिस प्रकार पहले कोई अन्य प्रकारसे प्रतिज्ञा कर फिर विपरीत भाषण करे, अर्थात् पहले ऐसी |