भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 722, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 722
७१२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३
तन्न; 'ते' इति प्रतिज्ञानात्; 'एष त आत्मा' इति हि प्रतिवचने प्रतिज्ञातम् । न चैकस्य कार्यकारणसङ्घातस्य द्वावात्मानौ उपपद्येते; एको हि कार्यकारणसङ्घात एकेनात्मना आत्मवान् । न च उषस्तस्यान्यः कहोलस्यान्यो जातितो भिन्न आत्मा भवति, द्वयोः अगौणत्वात्मत्वसर्वान्तरत्वानुपपत्तेः । यद्येकमगौणं ब्रह्म द्वयोरितरेणावश्यं गौणेन भवितव्यम्, तथा आत्मत्वं सर्वान्तरत्वं च, विरुद्धत्वात् पदार्थानाम् । यद्येकं सर्वान्तरं ब्रह्म आत्मा मुख्यः, इतरेण असर्वान्तरेण अनात्मना अमुख्येनावश्यं भवितव्यम्; तस्मादेकस्यैव द्विः श्रवणं विशेषविवक्षया ।<br><br>यत्तु पूर्वोक्तेन समानं द्वितीये प्रश्नान्तर उक्तम्, तावन्मात्रं पूर्व-ऐसा कहना ठीक नहीं है, क्योंकि 'तुम्हारा' ऐसी प्रतिज्ञा की गयी है, अर्थात् उत्तरमें ऐसी प्रतिज्ञा की गयी है कि 'यह तुम्हारा आत्मा है।' और एक ही देहेन्द्रियसंधातके दो आत्मा होने सम्भव नहीं हैं, क्योंकि एक देहेन्द्रियसंधात एक ही आत्मासे आत्मवान् होता है। उषस्तका आत्मा अन्य हो और कहोलका अन्य हो—ऐसा उनमें जातितः भेद नहीं हो सकता, क्योंकि दोका अगौणत्व (मुख्यत्व), आत्मत्व और सर्वान्तरत्व उपपन्न नहीं हो सकता। यदि दोमेंसे एक ब्रह्म मुख्य है तो दूसरेका गौण होना अवश्यम्भावी है; इसी प्रकार उनका आत्मत्व और सर्वान्तरत्व भी नहीं हो सकता, क्योंकि उन पदार्थोंमें विरुद्धता है। [अभिप्राय यह है कि] यदि एक सर्वान्तर ब्रह्म आत्मा मुख्य होगा तो दूसरेको अवश्य असर्वान्तर अनात्मा और अमुख्य होना चाहिये; अतः एकहीका कुछ विशेष विवक्षासे दो बार श्रवण हुआ है।<br><br>और जो बात दूसरे प्रश्नान्तरमें पूर्व प्रश्नके ही समान कही गयी है, उतना पहले ही प्रश्नका अनुवाद है,