भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 73, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 73

ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ [६७


मेधक्रतवौपयिकस्यार्कत्वम्कारणसे अर्क यानी अश्वमेधयज्ञमें उपयोगी अग्निका अर्कत्व है, अर्थात् यही उसके अर्कत्वमें हेतु है। यह अग्निके अर्क नामकी व्युत्पत्ति है। तात्पर्य यह है कि अर्चनसे यानी सुखकी हेतुभूता पूजा करनेसे तथा जलका सम्बन्ध होनेसे अग्निका (अर्क) यह गौण (गुणकृत) नाम है।
अर्कत्वे हेतुरित्यर्थः। अग्नेरर्क-
नामनिर्वचनमेतत्। अर्चनात्सु-
खहेतुपूजाकरणाद् अप्सम्बन्धाच्च
अग्नेरेतद्गौणं नामार्क इति।
य एवं यथोक्तमर्कस्यार्कत्वं-जो कोई इस प्रकार उपर्युक्त अर्कका अर्कत्व जानता है उसे क—जल या सुख होता है, क्योंकि 'क' यह जल और सुखका समान नाम है। 'ह' और 'वै' ये निश्चयार्थक निपात हैं। अर्थात् उसके लिये जल या सुख होता ही है। इसे—इस प्रकार जाननेवालेको अर्थात् इस प्रकार जाननेवालेके लिये [जल या सुख] होता है ॥१॥
वेद जानाति। कम्पुदकं सुखं वा
नामसामान्यात्। ह वा इत्यव-
धारणार्थौ। भवत्येवेति। अस्मै
एवंविदे एवंविदर्थं भवति ॥१॥

जलसे विराड्रूप अग्निकी उत्पत्ति

कः पुनरसावर्कः ? इत्युच्यते—यह अर्क कौन है ? सो बतलाया जाता है—

आपो वा अर्कस्तद्यदपाᳵ शर आसीत्तत्स-
महन्यत। सा पृथिव्यभवत्तस्यामश्राम्यत्तस्य श्रान्तस्य
तप्तस्य तेजोरसो निरवर्तताग्निः ॥ २ ॥

आप (जल) ही अर्क हैं। उस जलका जो शर (स्थूलभाग) था वह एकत्रित हो गया। वह पृथिवी हो गयी। उसके उत्पन्न होनेपर वह