बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 739, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 739
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७२९
| संस्कृत (मूल/भाष्य) | हिन्दी भाष्यार्थ |
|---|---|
| विरोध्येषणापरित्यागरूपत्वात्; अविद्याविषयत्वाच्चैषणायाः; तद्व्यतिरेकेण चास्त्याश्रमरूपं पारिव्राज्यं ब्रह्मलोकादिफलप्राप्तिसाधनम्, यद्विषयं यज्ञोपवीतादिसाधनविधानं लिङ्गविधानं च। | आत्मज्ञानकी विरोधिनी एषणाओंका परित्यागरूप है; कारण, एषणाएँ तो अविद्याका विषय हैं; उक्त संन्याससे भिन्न आश्रमरूप संन्यास ब्रह्मलोकादि फलकी प्राप्तिका साधन-भूत है, जिसके विषयमें कि यज्ञोपवीतादि साधन और लिङ्गोंका विधान किया गया है। |
| न च एषणारूपसाधनोपादानस्य आश्रमधर्ममात्रेण पारिव्राज्यान्तरे विषये सम्भवति सति, सर्वोपनिषद्विहितस्य आत्मज्ञानस्य बाधनं युक्तम्, यज्ञोपवीताद्यविद्याविषयैषणारूपसाधनोपादित्सायां चावश्यम् असाधनफलरूपस्य अशनायादिसंसारधर्मवर्जितस्य अहं ब्रह्मास्मि, इति विज्ञानं बाध्यते; न च तद्बाधनं युक्तम्, सर्वोपनिषदां तदर्थपरत्वात्। | तथा अन्य प्रकारके संन्यासमें आश्रमधर्ममात्रसे एषणारूप साधनोंका ग्रहण सम्भव है—इतनेहीसे सम्पूर्ण उपनिषदोंद्वारा प्रतिपाद्य आत्मज्ञानका बाध होना उचित नहीं है, यज्ञोपवीतादि अविद्याविषयक एषणारूप साधनोंको ग्रहण करनेकी इच्छा रहनेपर तो इस असाधन-फलरूप एवं क्षुधादि सांसारिक धर्मोंसे रहित आत्माके 'मैं ब्रह्म हूँ' विज्ञानका अवश्य बाध हो जायगा; और उसका बाध होना उचित नहीं है; क्योंकि समस्त उपनिषदोंका तात्पर्य उसीमें है। |
| 'भिक्षाचर्यं चरन्ति' इत्येषणां ग्राहयन्ती श्रुतिः स्वयमेव बाधत इति चेत्? अथापि स्यादेषणाभ्यो व्युत्थानं विधाय पुनरेषण- | पूर्व०-किंतु 'भिक्षाचर्यं चरन्ति' यह एषणाको ग्रहण करानेवाली श्रुति तो स्वयं ही उसका बाध कर रही है। तात्पर्य यह है कि यदि यह मान भी लिया जाय तो भी एषणाओंसे व्युत्थानका विधान करके श्रुति एषणाके ही एक देश |