बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 741, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७३१ |
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| पगम्यते हि तत् । यानि पारिव्राज्येऽभिहितानि वचनानि "यज्ञोपवीत्येवाधीयीत" इत्यादीनि, तान्यविद्वत्पारिव्राज्यमात्रविषयाणीति परिहृतानि; इतरथा आत्मज्ञानबाधः स्यादिति ह्युक्तम्; "निराशिपमनारम्भं निर्ममस्कारमस्तुतिम् । अक्षीणं क्षीणकर्माणं तं देवा ब्राह्मणं विदुः" इति सर्वकर्माभावं दर्शयति स्मृतिर्विदुषः; "विद्वाँल्लिङ्गविवर्जितः" "तस्मादलिङ्गो धर्मज्ञः" इति च । तस्मात् परमहंसपारिव्राज्यमेव व्युत्थानलक्षणं प्रतिपद्येतात्मवित् सर्वकर्मसाधनपरित्यागरूपमिति ।<br><br>यस्मात् पूर्वे ब्राह्मणा एतमात्मानम् असाधनफलस्वभावं विदित्वा | उसे स्वीकार करते हैं।^१ संन्यासाश्रममें जो "यज्ञोपवीती होकर ही अध्ययन करे" इत्यादि वचन कहे गये हैं, वे केवल अविद्वत्संन्यासमात्रसे सम्बन्ध रखनेवाले हैं—ऐसा कहकर उनका परित्याग किया जा चुका है; और यह भी कहा गया है कि यदि ऐसा न मानेंगे [ उन्हें विद्वत्संन्याससम्बन्धी समझेंगे ] तो आत्मज्ञानका बाध हो जायगा ।<br>"जिसे किसी प्रकारकी कामना नहीं है, जो सब प्रकारके आरम्भसे शून्य तथा नमस्कार और स्तुतिसे रहित है, जो स्वयं अक्षीण है, किंतु जिसके कर्मोंका क्षय हो चुका है, उसे देवगण ब्राह्मण ( ब्रह्मवेत्ता ) मानते हैं" यह स्मृति विद्वान्के समस्त कर्मोंका अभाव दिखाती है। तथा "विद्वान् लिङ्गरहित होता है" "अतः वह लिङ्गरहित और धर्मज्ञ होता है" इत्यादि वचन भी यही दिखलाते हैं। अतः आत्मवेत्ताको समस्त कर्म साधनोंके परित्यागरूप व्युत्थानलक्षण परमहंस पारिव्राज्यका ही आश्रय लेना चाहिये।<br><br>क्योंकि पूर्ववर्ती ब्राह्मण ( ब्रह्मज्ञ ) लोग इस असाधनफलस्वभाव आत्माको |
१. तथापि क्षुधादिकी निवृत्तिके लिये भिक्षाटनादिकी कर्तव्यता प्राप्त होनेके कारण उसकी विधि सार्थक ही है।