बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 747, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७३७
किसमें ओतप्रोत है?' [याज्ञवल्क्य-] 'हे गार्गि ! वायुमें।' [गार्गी-] 'वायु किसमें ओतप्रोत है?' [याज्ञवल्क्य-] 'हे गार्गि ! अन्तरिक्षलोकोंमें।' [गार्गी-] 'अन्तरिक्षलोक किसमें ओतप्रोत हैं?' [याज्ञवल्क्य-] 'हे गार्गि ! गन्धर्वलोकोंमें।' [गार्गी-] 'गन्धर्वलोक किसमें ओतप्रोत हैं?' [याज्ञवल्क्य-] 'हे गार्गि ! आदित्यलोकोंमें।' [गार्गी-] आदित्यलोक किसमें ओतप्रोत हैं?' [याज्ञवल्क्य-] 'हे गार्गि ! चन्द्रलोकोंमें।' [गार्गी-] 'चन्द्रलोक किसमें ओतप्रोत हैं?' [याज्ञवल्क्य-] 'हे गार्गि ! नक्षत्रलोकोंमें।' [गार्गी-] 'नक्षत्रलोक किसमें ओतप्रोत हैं?' [याज्ञवल्क्य-] 'हे गार्गि ! देवलोकोंमें।' [गार्गी-] 'देवलोक किसमें ओतप्रोत हैं?' [याज्ञवल्क्य-] 'हे गार्गि ! इन्द्रलोकोंमें।' [गार्गी-] 'इन्द्रलोक किसमें ओतप्रोत हैं?' [याज्ञवल्क्य-] 'हे गार्गि ! प्रजापतिलोकोंमें।' [गार्गी-] 'प्रजापतिलोक किसमें ओतप्रोत हैं?' [याज्ञवल्क्य-] 'हे गार्गि ! ब्रह्मलोकोंमें।' [गार्गी-] 'ब्रह्मलोक किसमें ओतप्रोत हैं?' इसपर याज्ञवल्क्यने कहा- 'हे गार्गि ! अतिप्रश्न मत कर। तेरा मस्तक न गिर जाय ! तू, जिसके विषयमें अतिप्रश्न नहीं करना चाहिये, उस देवताके विषयमें अतिप्रश्न कर रही है। हे गार्गि ! तू अतिप्रश्न न कर।' तब वचक्नुकी पुत्री गार्गी उपरत हो गयी ॥ १ ॥
| अथ हैनँ गार्गी नामतः, | फिर उस याज्ञवल्क्यसे वाचकनवी |
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| वाचकनवी वचक्नोर्दुहिता, पप्रच्छ; | वचक्नुकी पुत्रीने, जो नामसे गार्गी थी, पूछा। उसने 'हे याज्ञवल्क्य !' |
| याज्ञवल्क्येति होवाच; यदिदं | इस प्रकार सम्बोधित करके कहा— यह जो कुछ पार्थिव धातुसमुदाय है |
| सर्वं पार्थिवं धातुजातम् अप्सूदके | वह अप्—जलोंमें ओतप्रोत है; ओत—वस्त्रकी लंबाईके तन्तुके |
| ओतं च प्रोतं च, ओतं दीर्घपट- | समान और प्रोत—वस्त्रकी चौड़ाईके तन्तुके समान अथवा इससे उलटा |
| तन्तुवत् प्रोतं तिर्यक्तन्तुवद् विप- | समझो। तात्पर्य यह है कि यह अपने |
बृ० उ० ४७—