बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 749, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 749
| ब्राह्मण ६ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७३९ |
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| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| क्क तासामोतप्रोतभाव इति । एवमुत्तरोत्तरप्रश्नप्रसङ्गो योजयितव्यः । वायौ गार्गीति । | तो उनका ओतप्रोतभाव कहाँ है ? इसी प्रकार आगे-आगेके प्रश्नोंके प्रसङ्गकी योजना करनी चाहिये । [ याज्ञवल्क्य— ] 'हे गार्गि ! वायुमें ।' |
| नन्वग्नाविति वक्तव्यम् ! | **शङ्का—**किंतु यहाँ तो याज्ञवल्क्यको 'अग्निमें' ऐसा कहना चाहिये था ! |
| नैष दोषः; अग्नेः पार्थिवं वा आप्यं वा धातुमनाश्रित्य इतरभूतवत् स्वातन्त्र्येण आत्मलाभो नास्तीति तस्मिन्नोतप्रोतभावो नोपदिश्यते । | **समाधान—**ऐसा कहनेमें दोष नहीं है, क्योंकि अन्य भूतोंके समान अग्निके स्वरूपकी सिद्धि किसी पार्थिव या जलीय धातुका आश्रय लिये बिना नहीं होती, इसलिये उसमें ओतप्रोतभावका उपदेश नहीं किया जाता । |
| कस्मिन्नु खलु वायुरोतश्च प्रोतश्चेत्यन्तरिक्षलोकेषु गार्गीति तान्येव भूतानि संहतान्यन्तरिक्षलोकाः; तान्यपि गन्धर्वलोकेषु, गन्धर्वलोका आदित्यलोकेषु, आदित्यलोकाश्चन्द्रलोकेषु, चन्द्रलोका नक्षत्रलोकेषु, नक्षत्रलोका देवलोकेषु, देवलोका इन्द्रलोकेषु, इन्द्रलोका विराट्शरीरारम्भकेषु भूतेषु प्रजापतिलोकेषु, प्रजापतिलोका ब्रह्मलोकेषु । ब्रह्मलोका नाम अण्डारम्भकाणि भूतानि; सर्वत्र हि सूक्ष्मतारतम्यक्रमेण | ( गार्गी— ) 'वायु किसमें ओत-प्रोत है ?' ( याज्ञवल्क्य— ) 'हे गार्गि ! अन्तरिक्षलोकोंमें ।' परस्पर संहत हुए ये भूत ही अन्तरिक्षलोक हैं। वे भी गन्धर्वलोकोंमें, गन्धर्वलोक आदित्यलोकोंमें, आदित्यलोक चन्द्रलोकोंमें, चन्द्रलोक नक्षत्रलोकोंमें, नक्षत्रलोक देवलोकोंमें, देवलोक इन्द्रलोकोंमें, इन्द्रलोक विराट् शरीरके आरम्भक भूतरूप प्रजापतिलोकोंमें और प्रजापतिलोक ब्रह्मलोकोंमें ओतप्रोत हैं। ब्रह्मलोक ब्रह्माण्डके आरम्भक भूतोंको कहते हैं; इन सभी लोकोंमें सूक्ष्मताके तारतम्यक्रमसे प्राणियोंके |