भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 76, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 76
७०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

तीसरा भाग किया और वायुको तीसरा। इस प्रकार यह प्राण तीन भागोंमें हो गया। उसका पूर्व दिशा शिर है तथा इधर-उधरकी (ईशानी और आग्नेयी) विदिशाएँ बाहु हैं। इसी प्रकार पश्चिम दिशा इसका पुच्छ है तथा इधर-उधरकी (वायव्य और नैर्ऋत्य) विदिशाएँ जङ्घाएँ हैं। दक्षिण और उत्तर दिशाएँ उसके पार्श्व हैं, द्युलोक पृष्ठभाग है, अन्तरिक्ष उदर है, यह (पृथिवी) हृदय है। यह (अग्निरूप विराट्र प्रजापति) जलमें स्थित है। इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष जहाँ-कहीं जाता है वहीं प्रतिष्ठित होता है॥३॥

| स च जातः प्रजापतिस्त्रेधा त्रिप्रकारमात्मानं स्वयमेव कार्यकारणसंघातं व्यकुरुत व्यभजदित्येतत्। कथं त्रेधा? इत्याह— | उत्पन्न हुए उस प्रजापतिने भूत और इन्द्रियसंघातरूप अपनेको स्वयं ही त्रिधा-तीन प्रकारसे विकृत यानी विभक्त किया। किस प्रकार त्रिधा विभक्त किया? सो बतलाते हैं— | | आदित्यं तृतीयमग्निवाय्वपेक्षया त्रयाणां पूरणम् अकुरुतेत्यनुवर्तते। तथाग्न्यादित्यापेक्षया वायुं तृतीयम्। तथा वाय्वादित्यापेक्षयाग्निं तृतीयमिति द्रष्टव्यम्। सामर्थ्यस्य तुल्यत्वात्त्रयाणां संख्यापूरणत्वे। | उसने अग्नि और वायुकी अपेक्षा आदित्यको तीसरा बनाया; अर्थात् तीन संख्याओंका पूरक बनाया। इस वाक्यकी अनुवृत्ति होती है। इसी प्रकार अग्नि और आदित्यकी अपेक्षा वायुको तृतीय बनाया तथा वायु और आदित्यकी अपेक्षा अग्निको तृतीय बनाया—ऐसा समझना चाहिये, क्योंकि तीनकी संख्याको पूर्ण करनेमें इन तीनोंहीकी शक्ति समान है। | | स एष प्राणः सर्वभूतानामात्मापि अग्निवाय्वादित्यरूपेण विशेषतः स्वेनैव मृत्य्वात्मना | सम्पूर्ण भूतोंका आत्मा होनेपर भी यह प्राण विशेषतः अपने मृत्युरूपसे ही, न कि अपने विराट्र स्वरूपका लय करके, अग्नि, वायु |