बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 771, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७६१
| बाणवन्तौ शरौ, तयोरेव विशेषणं सपत्नातिव्याधिनौ शत्रोः पीडाकरावतिशयेन, हस्ते कृत्वोपोत्तिष्ठेत् समीपतः आत्मानं दर्शयेत् एवमेवाहं त्वा त्वां शरस्थानीयाभ्यां प्रश्नाभ्यां द्वाभ्यामुपोदस्थां उत्थितवत्यस्मि त्वत्समीपे। तौ मे ब्रूहीति—ब्रह्मविच्चेत्। आहेतरः—पृच्छ गार्गीति ॥२॥ | कि दो बाणवान् शर, इन्हींका विशेषण है 'सपत्नातिव्याधिनौ', इसका अर्थ है—शत्रुओंको अत्यन्त पीडा देनेवाले, ऐसे बाणोंको हाथमें लेकर उपस्थित हो—अपनेको पास जाकर दिखाये, उसी प्रकार मैं शरस्थानीय दो प्रश्न लेकर तुम्हारे निकट उपस्थित हुई हूँ, अतः यदि तुम ब्रह्मवेत्ता हो तो उनका उत्तर दो।' इसपर इतर (याज्ञवल्क्य) ने कहा—'गार्गि ! पूछ' ॥ २ ॥ |
पहला प्रश्न
सा होवाच यदूर्ध्वं याज्ञवल्क्य दिवो यदवाक् पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद् भूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याचक्षते कस्मिंस्तदोतं च प्रोतं चेति ॥३॥
वह बोली, 'हे याज्ञवल्क्य ! जो द्युलोकसे ऊपर है, जो पृथिवीसे नीचे है और जो द्युलोक और पृथिवीके मध्यमें है और स्वयं भी जो ये द्युलोक और पृथिवी हैं तथा जिन्हें भूत, वर्तमान और भविष्य-इस प्रकार कहते हैं, वे किसमें ओत-प्रोत हैं ?' ॥ ३ ॥
| सा होवाच—यदूर्ध्वमुपरि दिवःअण्डकपालाद्यच्चावागधः पृथिव्या अधोऽण्डकपालात्, यच्चान्तरा मध्ये द्यावापृथिवी | वह बोली, 'जो द्युलोकरूप अण्डकपालसे ऊर्ध्व—ऊपर है और जो पृथिवीसे यानी इस नीचेके अण्डकपालसे नीचे है तथा जो द्यावापृथिवीके मध्यमें है अर्थात् द्युलोक और |