भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 777, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 777
ब्राह्मण ८ ]शाङ्करभाष्यार्थ७६७
संस्कृतहिन्दी
एवमपाकृते प्रश्ने पुनर्गार्ग्याः प्रतिवचनं द्रष्टव्यम्—ब्रूहि किं तदक्षरम् ? यद् ब्राह्मणा अभिवदन्ति, इत्युक्त आह—अस्थूलं तत् स्थूलादन्यत्, एवं तर्ह्यणु ? अनणु, अस्तु तर्हि ह्रस्वम्, अह्रस्वम्; एवं तर्हि दीर्घम्, नापि दीर्घमदीर्घम्; एवमेतैश्चतुर्भिः परिमाणप्रतिषेधैर्द्रव्यधर्मः प्रतिषिद्धः, न द्रव्यं तदक्षरमित्यर्थः।इस प्रकार प्रश्नका निराकरण हो जानेपर फिर गार्गीका यह प्रश्न समझना चाहिये, 'अच्छा तो बताओ ब्रह्मवेत्ता लोग जिसका वर्णन करते हैं, वह अक्षर क्या है? ऐसा कहे जानेपर याज्ञवल्क्य कहते हैं—वह अस्थूल-स्थूलसे भिन्न है; तो क्या अणु (सूक्ष्म) है ? नहीं, अनणु (सूक्ष्मसे भिन्न) है; अच्छा तो ह्रस्व (छोटा) होगा ?—नहीं, वह ह्रस्व भी नहीं है; ऐसी बात है तो वह दीर्घ हो सकता है ? नहीं, दीर्घ भी नहीं है, अदीर्घ है; इस प्रकार उसके स्थूलत्व (मोटाई) आदि परिमाणका प्रतिषेध करनेवाले इन चार पदोंद्वारा द्रव्य-धर्मका निषेध किया गया है। तात्पर्य यह कि वह अक्षर द्रव्य नहीं है।
अस्तु तर्हि लोहितो गुणः, ततोऽप्यन्यदलोहितम्; आग्नेयो गुणो लोहितः; भवतु तर्ह्यपां स्नेहनम्, न, अस्नेहनम्; अस्तु तर्हिच्छाया, सर्वथाप्यनिर्देश्यत्वात्, छायाया अप्यन्यदच्छायम्; अस्तु तर्हि तमः, अतमः; भवतु वायुस्तर्हि, अवायुः; भवेत्तर्ह्याकाशम्,तो फिर वह लोहित ( लाल ) गुण हो सकता है ? नहीं उससे भी भिन्न अलोहित है; लोहित अग्निका गुण है; अच्छा तो जलका गुण स्नेहन ( द्रवीभाव ) होगा ? नहीं, वह अस्नेह है; तो फिर वह छाया होगा ? नहीं, सर्वथा ही अनिर्देश्य होनेके कारण छायासे भी भिन्न अच्छाय है; तो फिर तम होगा ? नहीं, अतम है; अच्छा तो वह वायु होगा ? नहीं, वह अवायु है; तो फिर आकाश