भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 81, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 81

ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ [७५


| प्रथमशरीरिणम्, अशनायावत्त्वा-<br>न्मृत्युराभिव्याददान्मुखविदारणं<br>कृतवानत्तुम्; स च कुमारो भीतः<br>स्वाभाविकाविद्यया युक्तो भाणि-<br>त्येवं शब्दमकरोत् । सैव वाग-<br>भवत्, वाक्-शब्दोऽभवत् ॥४॥ | इस प्रकार उत्पन्न हुए उस प्रथम-<br>शरीरी कुमार अग्निके प्रति, उसे<br>खानेके लिये, मुँह फाड़ा । उस<br>कुमारने स्वाभाविकी अविद्यासे युक्त<br>होनेके कारण डरकर 'भाण्' ऐसा<br>शब्द किया। वही वाक् हुआ, वाक्<br>यानी शब्द हुआ ॥ ४ ॥ |


ऋगादिकी उत्पत्ति और मृत्युके अत्तृत्वका उपन्यास

स ऐक्षत यदि वा इममभिमꣳस्ये कनीयोऽन्नं करिष्य इति स तया वाचा तेनात्मनेदꣳसर्वमसृजत यदिदंकिञ्चर्चो यजूंꣳषि सामानि छन्दांꣳसि यज्ञान्प्रजाः पशून् । स यद्यदेवास्सृजत तत्तदत्तु मध्रियत सर्वं वा अत्तीति तददितेरदितित्वम् । सर्वस्यैतस्यात्ता भवति सर्वमस्यान्नं भवति य एवमेतददितेरदितित्वं वेद॥५॥

उसने विचार किया, 'यदि मैं इसे मार डालूँगा तो यह थोड़ा-सा ही अन्न [ भोजन ] करूँगा।' अतः उसने उस वाणी और उन मनके द्वारा इन सबको रचा, जो कुछ भी ये ऋक्, यजुः, साम, छन्द, यज्ञ, प्रजा और पशु हैं। उसने जिस-जिसकी रचना की उसी-उसीको खानेका विचार किया। वह सबको खाता है, यही उस अदितिका अदितित्व है। जो इस प्रकार इस अदितिके अदितित्वको जानता है वह इस सबका अत्ता ( भोक्ता ) होता है और यह सब उसका अन्न होता है ॥ ५ ॥

| स ऐक्षत—स एवं भीतं कृतरवं<br>कुमारं दृष्ट्वा मृत्युरैक्षतेक्षितवान्<br>अशनायावानपि—यदि कदा-<br>चिद्वा इमं कुमारमभिमंस्ये— | उसने विचार किया—इस प्रकार<br>डरकर शब्द करनेवाले उस कुमार-<br>को देखकर मृत्युने क्षुधायुक्त होनेपर<br>भी विचार किया—यदि कदाचित् मैं<br>इस कुमारको मार डालूँगा—'अभि- |