भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 815, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 815

ब्राह्मण ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८०५


'शाकल्य !' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, 'इन ब्राह्मणोंने निश्चय ही तुम्हें अंगारे निकालनेका चिमटा बना रखा है' ॥ १८ ॥

शाकल्येति होवाच याज्ञ-'हे शाकल्य !' ऐसा याज्ञ-
वल्क्यः। त्वां स्विदिति वितर्के,वल्क्यने कहा। 'त्वां स्विद्' इसमें
इमे नूनं ब्राह्मणाः, अङ्गारावक्ष-'स्विद्' यह निपात वितर्क अर्थमें
यणम्—अङ्गारा अवक्षीयन्तेहै, निश्चय ही इन ब्राह्मणोंने तुम्हें
यस्मिन् सन्दंशादौ तदङ्गारावक्ष-अङ्गारावक्षयण-जिस चिमटे आदि-
यणम्—तद् नूनं त्वामक्रतपर अंगारे अवक्षीण होते अर्थात्
कृतवन्तो ब्राह्मणाः, त्वं तु तन्नपड़ते हैं, उसे अङ्गारावक्षयण कहते
बुध्यसे आत्मानं मया दह्यमानम्हैं-सो निश्चय ही तुम्हें इन ब्राह्मणों-
इत्यभिप्रायः ॥ १८ ॥ने आगमें जलनेवाला चिमटा ही
बना रखा है। अभिप्राय यह है कि
मेरे द्वारा तुम्हारा दाह हो रहा
है—किंतु तुम्हें इसका पता नहीं
है ॥ १८ ॥

देवता और प्रतिष्ठासहित दिशाओंके ज्ञानकी प्रतिज्ञा

याज्ञवल्क्येति होवाच शाकल्यो यदिदं कुरु-
पञ्चालानां ब्राह्मणानत्यवादीः किं ब्रह्म विद्वानिति
दिशो वेद सदेवाः सप्रतिष्ठा इति यद्दिशो वेत्थ
सदेवाः सप्रतिष्ठाः ॥ १९ ॥

'हे याज्ञवल्क्य !' ऐसा शाकल्यने कहा, 'यह जो तुम इन कुरुपाञ्चाल-देशीय ब्राह्मणोंपर आक्षेप करते हो सो क्या तुम ब्रह्मवेत्ता हो—ऐसी समझकर करते हो ?' [ याज्ञवल्क्य—मेरा ब्रह्मज्ञान यह है कि ] 'मैं देवता और प्रतिष्ठाके सहित दिशाओंका ज्ञान रखता हूँ।' [ शाकल्य— ] 'यदि तुम देवता और प्रतिष्ठाके सहित दिशाओंको जानते हो' ॥ १९ ॥

याज्ञवल्क्येति होवाच शाकल्यः—'हे याज्ञवल्क्य !' ऐसा शाकल्यने
यदिदं कुरुपञ्चालानां ब्राह्मणा-कहा, 'तुमने जो यह कुरुपाञ्चाल-
नत्यवादीः-अत्युक्तवानसि—स्वयंदेशीय ब्राह्मणोंका अतिवाद-अति-
भाषण (आक्षेपद्वारा तिरस्कार) किया