भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 820, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 820
८१०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

तेति श्रद्धायामिति यदा ह्येव श्रद्धत्तेऽथ दक्षिणां ददाति श्रद्धायाँ ह्येव दक्षिणा प्रतिष्ठितेति कस्मिन्नु श्रद्धा प्रतिष्ठितेति हृदय इति होवाच हृदयेन हि श्रद्धां जानाति हृदये ह्येव श्रद्धा प्रतिष्ठिता भवतीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ २१ ॥

'इस दक्षिण दिशामें तुम कौन-से देवतावाले हो ?' [ याज्ञवल्क्य— ] 'यमदेवतावाला हूँ' [ शाकल्य— ] 'वह यमदेवता किसमें प्रतिष्ठित है ?' [ याज्ञवल्क्य— ] 'यज्ञमें।' [ शाकल्य— ] 'यज्ञ किसमें प्रतिष्ठित है ?' [ याज्ञवल्क्य— ] 'दक्षिणामें।' [ शाकल्य— ] 'दक्षिणा किसमें प्रतिष्ठित है ?' [ याज्ञवल्क्य— ] 'श्रद्धामें, क्योंकि जब पुरुष श्रद्धा करता है, तभी दक्षिणा देता है, अतः श्रद्धामें ही दक्षिणा प्रतिष्ठित है।' [ शाकल्य— ] 'श्रद्धा किसमें प्रतिष्ठित है ?' याज्ञवल्क्यने कहा, हृदयमें, क्योंकि हृदयसे ही पुरुष श्रद्धाको जानता है, अतः हृदयमें ही श्रद्धा प्रतिष्ठित है।' [ शाकल्य— ] 'याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है' ॥ २१ ॥

किन्देवतोऽस्यां दक्षिणायां दिश्यसीति पूर्ववत् । दक्षिणायां दिशि का देवता तव ? यमदेवत इति, यमो देवता मम दक्षिणादिग्भूतस्य । स यमः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति ? यज्ञ इति—यज्ञे कारणे प्रतिष्ठितो यमः सह दिशा । कथं पुनर्यज्ञस्य कार्यं यमः ? इत्युच्यते—ऋत्विग्भिर्निष्पादितो यज्ञो दक्षिणया यजमानस्तेभ्यो यज्ञं निष्क्रीय तेन'किन्देवतोऽस्यां दक्षिणायां दिशि असि' इस वाक्यका अर्थ पूर्ववत् समझना चाहिये। अर्थात् दक्षिण दिशामें तुम्हारा कौन देवता है? 'मैं यम देवतावाला हूँ अर्थात् दक्षिण दिशारूपसे स्थित हुए मेरा यम देवता है।' 'वह यम किसमें प्रतिष्ठित है?' 'यज्ञमें' अर्थात् दिशाके सहित यम अपने कारणभूत यज्ञमें प्रतिष्ठित है। किंतु यम यज्ञका कार्य क्यों है ? सो बतलाया जाता है—यज्ञ ऋत्विजोंद्वारा निष्पन्न किया जाता है, उनसे दक्षिणाद्वारा यजमान यज्ञको खरीदकर उस यज्ञके द्वारा यमके