भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 822, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 822
८१२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

ष्ठिता इति रेतसीति कस्मिन्नु रेतः प्रतिष्ठितमिति हृदय इति तस्मादपि प्रतिरूपं जातमाहुर्हृदयादिव सृप्तो हृदयादिव निर्मित इति हृदये ह्येव रेतः प्रतिष्ठितं भवतीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ २२ ॥

'इस पश्चिम दिशामें तुम कौन-से देवतावाले हो ?' [ याज्ञवल्क्य—] 'वरुणदेवतावाला हूँ।' [ शाकल्य—] 'वह वरुण किसमें प्रतिष्ठित है?' [ याज्ञवल्क्य—] 'जलमें।' [ शाकल्य—] 'जल किसमें प्रतिष्ठित है?' [ याज्ञवल्क्य—] 'वीर्यमें।' [ शाकल्य—] 'वीर्य किसमें प्रतिष्ठित है?' [ याज्ञवल्क्य—] 'हृदयमें, इसीसे पिताके अनुरूप उत्पन्न हुए पुत्रको लोग कहते हैं कि यह मानो पिताके हृदयसे ही निकला है, मानो पिताके हृदय-से ही बना है, क्योंकि हृदयमें ही वीर्य स्थित रहता है।' [ शाकल्य—] 'याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है' ॥ २२ ॥

| किन्देवतोऽस्यां प्रतीच्यां दिश्यसीति ? तस्यां वरुणोऽधि-देवता मम । स वरुणः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति ? अप्स्विति—अपां हि वरुणः कार्यम्, "श्रद्धा वा आपः" "श्रद्धातो वरुणमसृजत" इति श्रुतेः । कस्मिन्नवापः प्रतिष्ठिता इति ? रेतसीति—"रेतसो ह्यापः सृष्टाः" इति श्रुतेः ।<br><br>कस्मिन्नु रेतः प्रतिष्ठितमिति ? हृदय इति—यस्माद् हृदयस्य कार्यं रेतः । कामो हृदयस्य वृत्तिः, | 'इस पश्चिम दिशामें तुम किस देवतावाले हो ?' 'उस दिशामें मेरा अधिष्ठातृदेव वरुण है।' 'वह वरुण किसमें प्रतिष्ठित है ?' 'जलमें'—क्योंकि वरुण जलका ही कार्य है, जैसा कि "श्रद्धा ही जल है," "श्रद्धासे वरुणको रचा" इत्यादि श्रुतिसे सिद्ध होता है।' 'जल किसमें प्रतिष्ठित है ?' 'वीर्यमें'—यह बात "वीर्यसे जलकी रचना हुई" इस श्रुतिसे कही गयी है।<br><br>'वीर्य किसमें प्रतिष्ठित है?' 'हृदयमें, —क्योंकि वीर्य हृदयका ही कार्य है। काम हृदयकी वृत्ति है, |