बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 885, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८७१
| समुपलभ्य परितुष्टो याज्ञवल्क्यस्तस्मै जनकाय ह किल वरं ददौ; स च जनको ह कामप्रश्नमेव वरं वव्रे वृतवान्; तं च वरं हास्मै ददौ याज्ञवल्क्यः; तेन वरप्रदानसामर्थ्येन अव्याचिख्यासुमपि याज्ञवल्क्यं तूष्णीं स्थितमपि सम्म्राडेव जनकः पूर्वं पप्रच्छ । <br><br> तत्रैवानुक्तिर्ब्रह्मविद्यायाः कर्मणा विरुद्धत्वात्; विद्यायाश्च स्वातन्त्र्यात्—स्वतन्त्रा हि ब्रह्मविद्या सहकारिसाधनान्तरनिरपेक्षा पुरुषार्थसाधनेति च ॥१॥ | विषयक ज्ञानको देखकर उससे संतुष्ट हो याज्ञवल्क्यने जनकको वर दिया था, उस जनकने उस समय इच्छानुसार प्रश्न करनेका वर ही माँगा था और याज्ञवल्क्य ने उसे यह वर दे दिया था; उस वरप्रदानके सामर्थ्यसे कुछ कहनेकी इच्छावाले न होने और चुप बैठे रहनेपर भी पहले राजा जनकने ही याज्ञवल्क्यसे पूछा । <br><br> कर्मसे विरुद्ध होनेके कारण उस कर्मकाण्डके प्रसङ्गमें ही ब्रह्मविद्याका वर्णन नहीं किया गया, क्योंकि विद्या तो स्वतन्त्र है—ब्रह्मविद्या स्वतन्त्र है, अन्य सहकारी साधनकी अपेक्षासे रहित है और पुरुषार्थकी साधनभूत है ॥ १ ॥ |
पुरुषके व्यवहारमें उपयोगी पाँच ज्योतियाँ
१—आदित्यज्योति
याज्ञवल्क्य किं ज्योतिरयं पुरुष इति । आदित्यज्योतिः सम्राडिति होवाचादित्येनैवायं ज्योतिषास्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥२॥
'हे याज्ञवल्क्य ! यह पुरुष किस ज्योतिवाला है ?' 'हे सम्राट् ! यह आदित्यरूप ज्योतिवाला है'—ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, 'यह आदित्यरूप ज्योतिसे ही बैठता, सब ओर जाता, कर्म करता और लौट जाता है । याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है' ॥ २ ॥