भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 891, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 891

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थे ८७७


| येण श्रोत्रमिन्द्रियं दीप्यते; श्रोत्रेन्द्रिये सम्प्रदीप्ते मनसि विवेक उपजायते; तेन मनसा बाह्यां चेष्टां प्रतिपद्यते—"मनसा ह्येव पश्यति मनसा शृणोति" ( बृ० उ० १ । ५ । ३ ) इति ब्राह्मणम् । | रूप विषयसे श्रोत्रेन्द्रिय दीप्त होती है; श्रोत्रेन्द्रियके सम्यक् प्रकारसे दीप्त होनेपर मनमें विवेक उत्पन्न होता है; उस मनसे बाह्य चेष्टाका अनुभव करता है; “मनसे ही देखता है, मनसे सुनता है” ऐसा प्रथम अध्यायके पञ्चम ब्राह्मणका कथन है। | | कथं पुनर्वाग्ज्योतिरिति, वाचो ज्योतिष्ट्वमप्रसिद्धमित्यत आह— तस्माद् वै सम्राड् यस्माद् वाचा ज्योतिषानुगृहीतोऽयं पुरुषो व्यवहरति, तस्मात् प्रसिद्धमेतद् वाचो ज्योतिष्ट्वम्; कथम् ? अपि-यत्र यस्मिन् काले प्रावृषि प्रायेण मेघान्धकारे सर्वज्योतिःप्रत्यस्तमये स्वोऽपि पाणिर्हस्तो न विस्पष्टं निर्ज्ञायते—अथ तस्मिन् काले सर्वचेष्टानिरोधे प्राप्ते बाह्यज्योतिषोऽभावाद् यत्र वागुच्चरति, श्वा वा भषति, गर्दभो वा रौति, उपव तत्र न्येति—तेन शब्देन ज्योतिषा श्रोत्रमनसोर्नैरन्तर्यं भवति, तेन ज्योतिष्कार्यत्वं वाक् प्रतिपद्यते, तेन वाचा ज्योतिषोपन्त्येत्येव— | किंतु वाक् किस प्रकार ज्योति है ? वाक्का ज्योति होना तो प्रसिद्ध नहीं है; इसीसे श्रुति कहती है;—इसीसे हे सम्राट् ! चूँकि यह पुरुष वाणीरूप ज्योतिसे अनुगृहीत होकर व्यवहार करता है, इसलिये इस वाणीका ज्योति होना प्रसिद्ध है । किस प्रकार ? [ सो बतलाते हैं—] जब-जिस समय वर्षाकालमें मेघके अन्धकारमें प्रायः समस्त ज्योतियोंके अस्त हो जानेपर अपने हाथका भी स्पष्टतया भान नहीं होता, उस समय समस्त चेष्टाओंका निरोध प्राप्त होनेपर बाह्यज्योतियोंका अभाव होनेसे जहाँ वाणीका उच्चारण होता है, कुत्ता भोंकता है अथवा गधा रेंकता है वहीं उसके समीप पुरुष चला जाता है; उस शब्दरूप ज्योतिसे श्रोत्र ओर मनकी निरन्तरता हो जाती है, इससे वाक् ज्योतिकी |