भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 893, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 893
ब्राह्मण ३ ]शाङ्करभाष्यार्थ८७९
शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
पुरुषस्य। एतदुक्तं भवति— जाग्रद्विषये बहिर्मुखानि करणानि चक्षुरादीन्यादित्यादिज्योतिर्भिरनुगृह्यमाणानि यदा, तदा स्फुटतरः संव्यवहारोऽस्य पुरुषस्य भवतीति; एवं तावज्जागरिते स्वावयवसंघातव्यतिरिक्तेनैव ज्योतिषा ज्योतिष्कार्यसिद्धिरस्य पुरुषस्य दृष्टा। तस्मात्ते वयं मन्यामहे—सर्वबाह्यज्योतिःप्रत्यस्तमयेऽपि स्वप्नसुषुप्तिकाले जागरिते च तादृगवस्थायां स्वावयवसंघातव्यतिरिक्तेनैव ज्योतिषा ज्योतिष्कार्यसिद्धिरस्येति, दृश्यते च स्वप्ने ज्योतिष्कार्यसिद्धिः—बन्धुसंगमनवियोगदर्शनं देशान्तरगमनादि च; सुषुप्ताच्चोत्थानम्—सुखमहमस्वाप्सं न किञ्चिदवेदिषमिति; तस्मादस्ति व्यतिरिक्तं किमपि ज्योतिः।है। यहाँ यह कहा गया है— जिस समय जाग्रत्-अवस्थामें आदित्यादि ज्योतियोंसे अनुगृहीत होनेवाली चक्षु आदि इन्द्रियाँ बहिर्मुख होती हैं, उस समय इस पुरुषका व्यवहार स्पष्टतर होता है; इस प्रकार जाग्रत्-अवस्थामें तो इस पुरुषके ज्योतिरसम्बन्धी कार्योंकी सिद्धि अपने अवयवसंघातसे व्यतिरिक्त ज्योतिके द्वारा ही देखी गयी है; अतः हम समझते हैं कि स्वप्न और सुषुप्तिकालमें सम्पूर्ण बाह्य ज्योतियोंके अस्त हो जानेपर तथा जाग्रत्कालमें भी ऐसी अवस्था आनेपर अपने अवयवसंघातसे व्यतिरिक्त ज्योतिके द्वारा ही इस पुरुषके ज्योतिरसम्बन्धी कार्यकी सिद्धि होती है; स्वप्नमें बन्धुओंके संयोग-वियोग दिखायी देने और देशान्तरमें जाने आदि ज्योतिके कार्योंकी सिद्धि देखी ही जाती है; इसी प्रकार सुषुप्तिसे उठना और 'मैं सुखसे सोया उस समय कुछ भी भान नहीं रहा' ऐसा अनुभव भी देखा ही जाता है। अतः कोई व्यतिरिक्त ज्योति है।