भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 903, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 903

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थे ८८९


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
कार्यकारणसंघातधर्मत्वं ज्योतिष इति यदुक्तम्, तन्न, अनुमानविरोधात्; आदित्यादिज्योतिर्वत् कार्यकारणसंघातादर्थान्तरं ज्योतिरिति ह्यनुमानमुक्तम्; तेन विरुध्यते इयं प्रतिज्ञा—कार्यकरणसंघातधर्मत्वं ज्योतिष इति।<br><br>तद्भावभावित्वं त्वसिद्धम्, मृते देहे ज्योतिषोऽदर्शनात्।तथा उस ज्योतिको जो देहेन्द्रियसंघातके धर्मवाली बतलाया, सो भी ठीक नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेसे अनुमानसे विरोध आता है; आदित्यादि ज्योतिके समान यह ज्योति देहेन्द्रियसंघातसे भिन्न पदार्थ है, ऐसा अनुमान कहा गया है; उस अनुमानसे इस प्रतिज्ञाका कि उस ज्योतिमें देहेन्द्रियसंघातका धर्मत्व है, विरोध आता है; देह तद्भावभावित है [अर्थात् जबतक देह है, तबतक उसके धर्मरूपसे चैतन्यज्योति भी रहती है] यह तुम्हारा हेतु तो असिद्ध है, क्योंकि मृत देहमें वह ज्योति नहीं देखी जाती।^१
सामान्यतो दृष्टस्यानुमानस्याप्रामाण्ये सति पानभोजनादिसर्वव्यवहारलोपप्रसङ्गः; स चानिष्टः; पानभोजनादिषु ही क्षुत्पिपासादिनिवृत्तिमुपलब्धवतः तत्सामान्यात् पानभोजनाद्युपादनं दृश्यमानं लोके न प्राप्नोति; दृश्यन्तेसामान्यतो दृष्ट अनुमानकी अप्रामाणिकता माननेपर तो भोजन और जलपानादि सभी व्यवहारोंके लोपका प्रसङ्ग उपस्थित होगा; और वह इष्ट नहीं है; क्योंकि तब तो, जलपान और भोजनादि करनेपर भूख और प्यासकी निवृत्ति देखनेवालेको उसीकी समानतासे लोकमें जलपान और भोजन ग्रहण करते दिखायी देना सिद्ध नहीं हो सकता [क्योंकि सामान्यतो दृष्ट नियमको वह

१ अतः इस हेतुके असिद्ध होनेसे तुम्हारा अनुमान अप्रामाणिक है, इससे आत्मज्योतिको देहेन्द्रियसंघातका धर्म नहीं सिद्ध किया जा सकता।