बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 906, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ८९२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| शरीरव्यतिरिक्ते सिद्धेऽपि करणा-<br>नि सर्वाणि विज्ञानवन्तीव, विवे-<br>कत आत्मनोऽनुपलब्धत्वात्;<br>अतोऽहं पृच्छामि-कतम<br>आत्मेति; कतमोऽसौ देहेन्द्रिय-<br>प्राणमनःसु, यस्त्वयोक्त आत्मा,<br>येन ज्योतिषास्त इत्युक्तम् । | अथवा आत्मा शरीरसे व्यतिरिक्त<br>सिद्ध होनेपर भी समस्त इन्द्रियाँ<br>विज्ञानवती-सी जान पड़ती हैं,<br>क्योंकि आत्मा उनसे पृथक्रूपसे<br>उपलब्ध नहीं होता । इसलिये मैं<br>पूछता हूँ कि आत्मा कौन-सा है ?<br>जिसका आपने उल्लेख किया है,<br>वह आत्मा शरीर, इन्द्रिय, प्राण<br>और मन—इनमेंसे कौन-सा है,<br>जिस ज्योतिके द्वारा पुरुष बैठता<br>है—ऐसा कहा गया है । | | अथवा योऽयमात्मा त्वया-<br>भिप्रेतो विज्ञानमयः, सर्व इमे<br>प्राणा विज्ञानमया इव, एषु<br>प्राणेषु कतमः ? यथा समुदितेषु<br>ब्राह्मणेषु, सर्व इमे तेजस्विनः<br>कतम एषु षडङ्गविदिति । | अथवा जो यह आत्मा आपको<br>विज्ञानमयरूपसे अभिप्रेत है, सो ये<br>सभी प्राण विज्ञानमयके समान हैं,<br>इन प्राणोंमें वह कौन-सा है ? जिस<br>प्रकार उपस्थित ब्राह्मणोंमें ये सभी<br>तेजस्वी हैं, इनमें छहों वेदाङ्गोंका<br>जाननेवाला कौन है ? [ ऐसा<br>प्रश्न किया जाय । ] | | पूर्वस्मिन् व्याख्याने कतम<br>आत्मेत्येतावदेव प्रश्नवाक्यम्,<br>योऽयं विज्ञानमय इति प्रति-<br>वचनम् ; द्वितीये तु व्याख्याने<br>प्राणेष्वित्येवमन्तं प्रश्नवाक्यम् ।<br>अथवा सर्वमेव प्रश्नवाक्यम्—<br>विज्ञानमयो हृद्यन्तर्ज्योतिः<br>पुरुषः कतम इत्येतदन्तम् ।<br>योऽयं विज्ञानमय इत्येतस्य<br>शब्दस्य निर्धारितार्थविशेष- | [ इन दोनों व्याख्याओंमेंसे ]<br>पूर्व व्याख्यामें 'कतम आत्मा'<br>(कौन-सा आत्मा है) इतना ही<br>प्रश्नवाक्य है, और 'योऽयं विज्ञान-<br>मयः' इत्यादि उत्तर है; तथा<br>दूसरी व्याख्यामें 'प्राणेषु' यहाँ तक<br>प्रश्न वाक्य हे अथवा 'विज्ञानमयो<br>हृद्यन्तर्ज्योतिः पुरुषः' कतमः यहाँ<br>तक सारा ही प्रश्नवाक्य है । किंतु<br>'योऽयं विज्ञानमयः' इस शब्दका<br>निश्चित अर्थविशेषसे सम्बन्ध |