भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 914, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 914
९००बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ४

| तत्समानो भवति, तथा बुद्धिमवभासयन् बुद्धिद्वारेण कृत्स्नं क्षेत्रमवभासयति—इत्युक्तं मरकतमणिनिदर्शनेन। तेन सर्वेण समानो बुद्धिसामान्यद्वारेण। | समय वह तद्रूप हो जाता है। इसी प्रकार बुद्धिको प्रकाशित करते समय वह बुद्धिके द्वारा सम्पूर्ण क्षेत्रको प्रकाशित करने लगता है; यह बात मरकतमणिके दृष्टान्तसे बतला दी गयी है। इसीसे बुद्धिकी समानताके द्वारा वह सबके समान हो जाता है। | | 'सर्वमयः' इति चात एव वक्ष्यति; तेनासौ कुतश्चित् प्रविभज्य मुञ्जेषीकावत् स्वेन ज्योतिरूपेण दर्शयितुं न शक्यत इति, सर्वव्यापारं तत्राध्यारोप्य नामरूपगतम्, ज्योतिर्धर्मं च नामरूपयोः, नामरूपे चात्मज्योतिषि, सर्वो लोको मोमुह्यते—अयमात्मा नायमात्मा, एवंधर्मा नैवंधर्मा, कर्ताऽकर्ता, शुद्धोऽशुद्धो बद्धो मुक्तः, स्थितो गत आगतः, अस्ति नास्तीत्यादिविकल्पैः। | इसीसे श्रुति उसे 'सर्वमयः' ऐसा कहेगी; अतः यह मूँजसे सींकके समान किसीसे भी अलग करके अपने ज्योतिःस्वरूपसे नहीं दिखाया जा सकता। उसमें नाम-रूपके सारे व्यापारोंका, नाम-रूपमें ज्योतिके धर्मका तथा आत्मज्योतिमें नाम-रूपका आरोप करके सम्पूर्ण लोक 'यह आत्मा है, यह आत्मा नहीं है, आत्मा ऐसे धर्मोंवाला है, ऐसे धर्मोंवाला नहीं है, कर्ता है, अकर्ता है, शुद्ध है, अशुद्ध है, बद्ध है, मुक्त है, स्थित है, गत है, आगत है, सद्रूप है, असद्रूप है' इत्यादि विकल्पोंसे अत्यन्त मोहित हो रहा है। | | अतः समानः सन्नुभौ लोकौ प्रतिपन्नप्रतिपत्तव्यौ इहलोकपरलोकावुपात्तदेहेन्द्रियादिसङ्घातत्यागान्योपादानसन्तानप्रबन्धशतसन्निपातैरनुक्रमेण सञ्चरति। | अतः यह समान रहकर प्राप्त इहलोक और प्राप्त करने योग्य परलोक—इन दोनोंमें प्राप्त देहेन्द्रियसङ्घातके त्याग और अप्राप्त देहेन्द्रिय सङ्घातके ग्रहणकी परम्परासे निरन्तर सैकड़ों सम्बन्धोंके क्रमसे सञ्चार करता रहता है। तात्पर्य यह है कि उसके |

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