बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 917, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 917
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९०३
| संस्कृत शाङ्करभाष्य | हिन्दी अनुवाद |
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| वतिष्ठते यस्मात्—तस्मात् स्वयंज्योतिःस्वभाव एवासौ; विशुद्धः स कर्तृक्रियाकारकफलशून्यः परमार्थतः, धीसादृश्यमेव तु उभयलोकसञ्चारादिसंव्यवहारभ्रान्तिहेतुः। | स्थित रहता है, इसलिये यह स्वयं-ज्योतिःस्वरूप ही है; वह वस्तुतः कर्ता, क्रिया, कारक एवं फलसे रहित शुद्धस्वरूप है, उसके दोनों लोकोंमें सञ्चारादि व्यवहाररूप भ्रान्तिकी हेतु बुद्धिके समान होना ही है। |
| मृत्यो रूपाणि, मृत्युः कर्माविद्यादिः, न तस्यान्यद् रूपं स्वतः, कार्यकारणान्येवास्य रूपाणि; अतस्तानि मृत्यो रूपाण्यतिक्रामति क्रियाफलाश्रयाणि। | मृत्युके रूपोंको—कर्म एवं अविद्यादि ही मृत्यु हैं, इनके सिवा उसका स्वतः कोई रूप नहीं है; देह और इन्द्रियाँ ही उसके रूप हैं; अतः कर्म और फलके आश्रयभूत उन मृत्युके रूपोंको वह पार कर जाता है। |
| ननु नास्त्येव धिया समान-[व्यतिरिक्तात्म-सत्तायामाक्षेपः] मन्यद् धियोऽवभासकमात्मज्योतिः, धीव्यतिरेकेण प्रत्यक्षेण वा अनुमानेन वानुपलम्भात्—यथान्या तत्काल एव द्वितीया धीः। यच्चवभास्यावभासकयोरन्यत्वेऽपि विवेकानुपलम्भात् सादृश्यमिति घटाद्यालोकयोः—तत्र भवत्वन्यत्वे न आलोकस्योपलम्भाद् घटादेः, संश्लिष्टयोः सादृश्यं भिन्नयोरेव; न च तथेह घटादेरिव धियोऽव- | पूर्व०—किंतु बुद्धिके समान बुद्धिको प्रकाशित करनेवाली कोई अन्य आत्मज्योति तो है नहीं, क्योंकि प्रत्यक्ष अथवा अनुमानसे भी बुद्धिसे व्यतिरिक्त उसकी उपलब्धि नहीं होती जिस प्रकार कि उसी कालमें [अर्थात् एक बुद्धिकी उपलब्धिके समय] दूसरी बुद्धिकी उपलब्धि नहीं होती। और ऐसा जो कहा कि अवभास्य घट आदि और अवभासक आलोकका भेद होनेपर भी विवेक न हो सकनेके कारण सादृश्य है, सो वहाँ आलोककी भिन्नरूपसे उपलब्धि होनेके कारण उन दोनोंके भिन्न होनेपर भी घटादिके साथ मिलनेपर सदृशता हो सकती है, किंतु यहाँ |