बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 919, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९०५
| शून्यवादिमतानुवादः एवं तस्यैव विज्ञानस्य ग्राह्यग्राहकाकारतामलं परिकल्प्य, तस्यैव पुनर्विशुद्धिं परिकल्पयन्ति; तद्ग्राह्यग्राहकविनिर्मुक्तं विज्ञानं स्वच्छीभूतं क्षणिकं व्यवतिष्ठत इति केचित् । तस्यापि शान्तिं केचिदिच्छन्ति; तदपि विज्ञानं संवृतं ग्राह्यग्राहकांशविनिर्मुक्तं शून्यमेव घटादिबाह्यवस्तुवदित्यपरे माध्यमिका आचक्षते । | सिद्धान्ती— इस प्रकार उस विज्ञानकी ही ग्राह्य-ग्राहकाकारताकी पूर्णतया कल्पना कर फिर उसीकी अत्यन्त शुद्धिकी कल्पना करते हैं; वह ग्राह्य-ग्राहकभावसे रहित विज्ञान स्वच्छ और क्षणिकरूपसे स्थित है—ऐसा किन्हीं-किन्हींका मत है। कोई तो उस क्षणिक विज्ञानकी भी शान्ति करना चाहते हैं; अविद्यासे आच्छादित वह विज्ञान भी घटादि बाह्य वस्तुओंके समान ग्राह्य-ग्राहकांशसे रहित शून्यमात्र ही है—ऐसा दूसरे माध्यमिक बौद्ध कहते हैं। | | तन्निरासः सर्वा एताः कल्पना बुद्धिविज्ञानावभासकस्य व्यतिरिक्तस्यात्मज्योतिषोऽपह्नवादस्य श्रेयोमार्गस्य प्रतिपक्षभूतावैदिकस्य । तत्र येषां बाह्योऽर्थोऽस्ति, तान् प्रत्युच्यते— | ये सारी कल्पनाएँ बुद्धिरूप विज्ञानके अवभासक एवं उससे व्यतिरिक्त आत्मज्योतिका त्याग करनेवाली होनेसे इस वैदिक कल्याणमार्गकी विघ्नरूपा हैं। अब जिनके मतमें घटादि बाह्य पदार्थकी सत्ता है, उनसे कहा जाता है— | | न तावत् स्वात्मावभासकत्वं घटादेः, तमस्यवस्थितो घटादिस्तावन्न कदाचिदपि स्वात्मनावभास्यते; प्रदीपाद्यालोकसंयोगेन तु नियमेनैवावभास्यमानो दृष्टः सालोको घट इति; संश्लिष्टयोरपि घटालोकयोरन्य- | घटादि स्वयं ही अपने प्रकाशक हों—ऐसी बात तो है नहीं; अँधेरेमें रखे हुए घटादि तो कभी अपने-आप प्रकाशित होते ही नहीं; हाँ, दीपकादिके प्रकाशसे संयोग होनेपर तो 'यह घट प्रकाशयुक्त है' इस प्रकार उसका नियमसे प्रकाशित होना देखा जाता है; मिले हुए घट और प्रकाश भी एक-दूसरे- |