भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 925, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 925

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९११


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
युक्ता भवितुम् । तस्मान्नास्ति बाह्योऽर्थो घटप्रदीपादिः, विज्ञानमात्रमेव तु सर्वम्; तत्र यदुक्तम्—विज्ञानस्य व्यतिरिक्तावभास्यत्वाद् विज्ञानव्यतिरिक्तमस्ति ज्योतिरन्तरं घटादेरिवेति, तन्मिथ्या, सर्वस्य विज्ञानमात्रत्वे दृष्टान्ताभावात् ।मात्रता ही होनी उचित है अतः घट एवं प्रदीपादि बाह्य पदार्थ हैं ही नहीं, सब कुछ विज्ञानमात्र ही है; ऐसी स्थितिमें जो यह कहा गया कि घटादिके समान विज्ञान भी अपनेसे भिन्न साक्षीद्वारा भाष्य है, इसलिये उससे व्यतिरिक्त कोई अन्य ज्योति है, सो यह ठीक नहीं, क्योंकि जब सभी विज्ञानमात्र है, तो [उससे भिन्न कोई अन्य ज्योति है; इसमें] कोई दृष्टान्त नहीं हो सकता।
न, यावत्तावदभ्युपगमात्— <br><br> न तु बाह्योऽर्थो भवता एकान्तेनैव नाभ्युपगम्यते;सिद्धान्ती—ऐसी बात मत कहो, जहांतक तुम बाह्यार्थकी सत्ता स्वीकार करते हो वहाँतक तो है ही। तुम सर्वथा ही बाह्यार्थ न मानते हो—ऐसी बात तो है नहीं।
ननु मया नाभ्युपगम्यत एव ।विज्ञान०—हां, मैं तो नहीं ही मानता।
न, विज्ञानं घटः प्रदीप इति च शब्दार्थपृथक्त्वाद् यावत्, तावदपि बाह्यमर्थान्तरमवश्यमभ्युपगन्तव्यम् । विज्ञानादर्थान्तरं वस्तु न चेदभ्युपगम्यते, विज्ञानं घटः पट इत्येवमादीनां शब्दानामेकार्थत्वे पर्यायशब्दत्वं प्राप्नोति ।सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि 'विज्ञान, घट, प्रदीप' इत्यादि शब्द और इनके अर्थ पृथक् हैं, जबतक ऐसा है, तबतक भी तुम्हें बाह्य अर्थान्तर अवश्य स्वीकार करना होगा । यदि विज्ञानसे भिन्न कोई अन्य पदार्थ नहीं माना जायगा तो विज्ञान, घट, पट इत्यादि शब्दोंका एक (विज्ञान-मात्र) ही अर्थ माननेपर इनका पर्याय शब्द होना सिद्ध होगा।