बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 930, कुल 1402 में से
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९१६ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय ४
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| तेनेदं सदृशमिति हि सादृश्यप्रत्ययो भवति; तेनेति दृष्टस्मरणम्, इदमिति वर्तमानप्रत्ययः; तेनेति दृष्टं स्मृत्वा, यावदिदमिति वर्तमानक्षणकालमवतिष्ठेत, ततः क्षणिकवादहानिः; अथ तेनेत्येवोपक्षीणः स्मार्तः प्रत्ययः, इदमिति चान्य एव वार्तमानिकः प्रत्ययः क्षीयते, ततः सादृश्यप्रत्ययानुपपत्तिस्तेनेदं सदृशमिति अनेकदर्शिन एकस्याभावात्; <br><br> व्यपदेशानुपपत्तिश्च—द्रष्टव्यदर्शनेनैवोपक्षयाद् विज्ञानस्येदं पश्याम्यदोऽद्राक्षमिति व्यपदेशानुपपत्तिः, दृष्टवतो व्यपदेशक्षणानवस्थानात्; अथावतिष्ठेत, क्षणिकवादहानिः; अथादृष्टवतो व्यपदेशः सादृश्यप्रत्ययश्च, तदानीं जात्यन्धस्येव रूपविशेषव्यपदेश- | है, यह उसके समान है' ऐसा सादृश्यप्रत्यय हुआ करता है, 'उसके' यह पहले देखे हुएका स्मरण है और 'यह' इस पदसे वर्तमानकी प्रतीति होती है; यदि 'तेन' इस प्रकार पहले देखे हुएको स्मरण रखकर देखनेवाला 'इदम्' ऐसे अनुभवपर्यन्त वर्तमान क्षणकालतक रहेगा तो क्षणिकवादकी हानि होगी; और यदि 'तेन' इतनेहीसे स्मृतिज्ञान क्षीण हो गया और 'इदम्' ऐसा दूसरा ही वार्तमानिक ज्ञान क्षीण होता है तो ऐसी अवस्थामें सादृश्यज्ञान होना सम्भव नहीं है, 'क्योंकि यह उसके समान है' इस प्रकार [ इस और उस ] अनेक वस्तुओंको देखनेवाला कोई एक नहीं है। <br><br> [ विज्ञानकी क्षणिकता माननेपर ] व्यवहारकी भी सिद्धि नहीं हो सकती, क्योंकि विज्ञान तो द्रष्टव्यको देखकर ही क्षीण हो जाता है। 'मैं यह देखता हूँ' 'मैंने इसे देखा' ऐसा व्यवहार सम्भव नहीं है, क्योंकि जो देखनेवाला है, वह ऐसा कहनेके क्षणमें नहीं रहता; यदि मानें कि रहता है तो क्षणिकवादकी हानि होती है; यदि वह कथन न देखनेवालेका है और कहो कि उसीको सादृश्यप्रत्यय होता है तो उस अवस्थामें वह जन्मान्धके |