बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 937, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९२३
आत्माके दो स्थानोंका वर्णन
| ननु न स्तोऽस्योभौ लोकौ, यौ जन्ममरणाभ्यामनुक्रमेण संचरति स्वप्नजागरिते इव, स्वप्नजागरिते तु प्रत्यक्षमवगम्येते, न त्विहलोकपरलोकौ केनचित् प्रमाणेन, तस्मादेते एव स्वप्नजागरिते इहलोकपरलोकौ । इत्युच्यते— | किंतु स्वप्न और जाग्रत्के समान यह पुरुष जन्म और मरणके द्वारा क्रमशः जिनमें संचार करता है, इसके वे दोनों लोक तो हैं नहीं; स्वप्न और जाग्रत् तो प्रत्यक्ष जाने जाते हैं, किंतु इहलोक और परलोकका तो किसी भी प्रमाणसे ज्ञान नहीं होता, अतः ये स्वप्न और जागरित ही इहलोक और परलोक हैं। इसपर कहा जाता है— |
तस्य वा एतस्य पुरुषस्य द्वे एव स्थाने भवत इदं च परलोकस्थानं च संध्यं तृतीयँ स्वप्नस्थानं तस्मिन् संध्ये स्थाने तिष्ठन्नेते उभे स्थाने पश्यतीदं च परलोकस्थानं च। अथ यथाक्रमोऽयं परलोकस्थाने भवति तमाक्रममाक्रम्योभयान् पाप्मन आनन्दाँश्च पश्यति स यत्र प्रस्वपित्यस्य लोकस्य सर्वावतो मात्रामपादाय स्वयं विहत्य स्वयं निर्माय स्वेन भासा स्वेन ज्योतिषा प्रस्वपित्यत्रायं पुरुषः स्वयं ज्योतिर्भवति ॥ ९ ॥
उस इस पुरुषके दो ही स्थान हैं—यह लोक और परलोकसम्बन्धी स्थान; तीसरा स्वप्नस्थान संध्यस्थान है। उस संध्यस्थानमें स्थित रहकर यह इस लोकरूप स्थान और परलोकस्थान—इन दोनोंको देखता है। यह पुरुष परलोकस्थानके लिये जैसे साधनसे सम्पन्न होता है, उस साधनका आश्रय लेकर यह पाप (पापका फलरूप दुःख) और आनन्द दोनों-