बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 94, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ८८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| विरुद्धम्; न स्वाभाविकपाप्मा-<br>सङ्गविषयत्वादतिक्रमणस्य ।<br>कोऽसौ स्वाभाविकः पाप्मा-<br>सङ्गो मृत्युः ? कुतो वा<br>तस्योद्भवः ? केन वा तस्याति-<br>क्रमणम् ? कथं वा ? इत्ये-<br>तस्यार्थस्य प्रकाशनायाख्यायि-<br>कारभ्यते । कथम्— | विरुद्ध है ही—तो यह बात भी नहीं है, क्योंकि इस अतिक्रमणका विषय स्वाभाविक पापका सङ्ग होना है।<br>यह स्वाभाविक पापका सङ्गरूप मृत्यु क्या है ? कहाँसे उसकी उत्पत्ति होती है ? किसके द्वारा उसका अतिक्रमण हो सकता है ? और किस प्रकार हो सकता है ? इन सब बातोंको प्रकाशित करनेके लिये यह आख्यायिका आरम्भ की जाती है। सो किस प्रकार-- |
देव और असुरोंकी स्पर्धा, देवताओंका उद्गीथ-सम्बन्धी विचार
द्वया ह प्राजापत्या देवाश्चासुराश्च। ततः कनीयसा एव देवा ज्यायसा असुरास्त एषु लोकेष्वस्पर्धन्त ते ह देवा ऊचुर्हन्तासुरान्यज्ञ उद्गीथेनात्ययामेति ॥ १॥
प्रजापतिके दो प्रकारके पुत्र थे--देव और असुर। उनमें देव थोड़े ही थे और असुर अधिक थे। इन लोकोंमें वे परस्पर स्पर्धा (डाह) करने लगे। उनमेंसे देवताओंने कहा, 'हम यज्ञमें उद्गीथके द्वारा असुरोंका अतिक्रमण करें' ॥ १॥
| द्वया द्विप्रकाराः । हेति पूर्व-<br>वृत्तावद्योतको निपातः। वर्तमान-<br>प्रजापतेः पूर्वजन्मनि यद् वृत्तं<br>तदवद्योतयति हशब्देन । प्राजा- | द्वयाः—दो प्रकारके। 'ह' यह पूर्ववृत्तान्तका द्योतक निपात है। वर्तमान प्रजापतिके पूर्वजन्ममें जो कुछ हुआ था उसे ही श्रुति 'ह' शब्दसे द्योतित करती है। 'प्राजापत्याः'—जिस जन्ममें पूर्ववृत्त |