भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 941, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 941

| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९२७ | | :--- | :--- | | पूर्वदृष्टस्मृतिर्हि स्वप्नः प्रायेण;<br>तेन स्वप्नजागरितस्थानव्यतिरे-<br>केण इत उभौ लोकौ ।<br>यदादित्यादिबाह्यज्योतिषाम-<br>भावेऽयं कार्यकारणसंघातः पुरुषः<br>येन व्यतिरिक्तेन आत्मना ज्यो-<br>तिषा व्यवहरतीत्युक्तम्—तदेव<br>नास्ति, यद् आदित्यादिज्योति-<br>षामभावगमनम्, यत्रेदं विविक्तं<br>स्वयंज्योतिरूपलभ्येत; येन सर्व-<br>दैवायं कार्यकारणसंघातः संसृष्ट<br>एवोपलभ्यते तस्मादसत्समो-<br>ऽसन्नेव वा स्वेन विविक्तस्वभा-<br>वेन ज्योतीरूपेणात्मेति । अथ<br>क्वचिद् विविक्तः स्वेन ज्योती-<br>रूपेणोपलभ्येत बाह्याध्यात्मिक-<br>भूतभौतिकसंसर्गशून्यः, ततो<br>यथोक्तं सर्वं भविष्यतीत्येतदर्थ-<br>माह—<br>स यः प्रकृत आत्मा यत्र<br>यस्मिन् काले प्रस्वपिति प्रकर्षेण<br>स्वापमनुभवति; तदा किमुपादानः | अधिकतर तो पहले देखे हुएकी<br>स्मृतिका नाम ही स्वप्न है । अतः<br>दोनों लोक स्वप्न और जागरित-<br>स्थानोंसे भिन्न हैं ।<br>जिन आदित्यादि बाह्यज्योति-<br>योंके अभावमें यह देहेन्द्रियसंघात-<br>रूप पुरुष जिस अपनेसे भिन्न<br>आत्मज्योतिके द्वारा व्यवहार करता<br>है—ऐसा कहा गया है, सो उन<br>आदित्यादि ज्योतियोंका जो अभाव<br>होना है, जहां कि इस विशुद्ध<br>स्वयंज्योति आत्माकी उपलब्धि<br>होती है, वह स्थान ही नहीं है;<br>क्योंकि यह देहेन्द्रियसंघात सर्वदा<br>बाह्यज्योतियोंसे संश्लिष्ट ही देखा<br>जाता है; अतः अपने विविक्तस्वभाव<br>ज्योतीरूपसे यह आत्मा असत्के<br>समान अर्थात् असत् ही है । यदि<br>यह कभी बाह्य, आध्यात्मिक तथा<br>भूत और भौतिक पदार्थोंके संसर्गसे<br>शून्य अपने विशुद्ध ज्योतिःस्वरूपसे<br>उपलब्ध होता, तो ऊपर कहा हुआ<br>सब कुछ हो सकता था—इसलिये<br>श्रुति कहती है—<br>जो प्रकृत आत्मा है, वह जिस<br>समय 'प्रस्वपिति'--प्रकर्षतया स्वाप<br>(निद्रा) का अनुभव करता है, उस<br>समय वह किस उपादानवाला होकर |