बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 945, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 945
ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ९३१
| संस्कृत मूल / भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| दिलक्षणःसर्वो व्यवहारो दृश्यते, चक्षुराद्यनुग्राहकाश्च आदित्याद्या लोकास्तथैव दृश्यन्ते यथा जागरिते—तत्र कथं विशेषावधारणं क्रियते—अत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिर्भवतीति ? | भी ग्राह्य-ग्राहकादिरूप सारा व्यवहार देखा जाता है तथा चक्षु आदि इन्द्रियोंके उपकारक आदित्यादि लोक भी उसी प्रकार देखे जाते हैं, जैसे कि जागरित-अवस्थामें देखे जाते थे, फिर 'इस अवस्था में यह पुरुष स्वयंज्योति होता है' इस प्रकार विशेषरूपसे निश्चय क्यों किया जाता है ? |
| उच्यते—वैलक्षण्यात् स्वप्नदर्शनस्य; जागरिते हि इन्द्रियबुद्धिमनआलोकादिव्यापारसंकीर्णमात्मज्योतिः; इह तु स्वप्ने इन्द्रियाभावात् तदनुग्राहकादित्याद्यालोकाभावाच्च विविक्तं केवलं भवति तस्माद् वैलक्षणम् । | समाधान-बतलाते हैं—क्योंकि स्वप्नदर्शनकी जागरितसे विलक्षणता है, जागरित-अवस्थामें आत्म-ज्योति इन्द्रिय, बुद्धि, मन और आलोकादि व्यापारसे व्याप्त रहती है किंतु यहां स्वप्नमें तो इन्द्रियोंके अभाव तथा उनके उपकारक आदित्यादिके प्रकाशके अभावके कारण वह विशुद्ध अर्थात् केवल रहती है, इसलिये यह विलक्षण है। |
| ननु तथैव विषया उपलभ्यन्ते स्वप्नेऽपि, यथा जागरिते; तत्र कथमिन्द्रियाभावाद् वैलक्षण्यमुच्यत इति ?<br><br>शृणु— | शङ्का—किंतु जिस प्रकार जागरितमें दिखायी देते हैं उसी प्रकार स्वप्नमें भी विषयोंकी उपलब्धि होती ही है, फिर इन्द्रियोंके अभावके कारण ही उसकी विलक्षणता क्यों बतायी जाती है ?<br><br>समाधान—सुनो— |