बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 954, कुल 1402 में से
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| ९४० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४ |
|---|
| संस्कृत-भाष्यम् | हिन्दी-अनुवाद |
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| द्यत इति; तदेतदाह—दुर्भिषज्यं हास्मै भवति यमेष न प्रतिपद्यते; यमिन्द्रियद्वारदेशम्—यस्माद्देशाच्छुक्रमादायापसृतस्तमिन्द्रियदेशम्—एष आत्मा पुनर्न प्रतिपद्यते, कदाचिद् व्यत्यासेनेन्द्रियमात्राः प्रवेशयति, तत आन्ध्यबाधिर्यादिदोषप्राप्तौ दुर्भिषज्यं दुःखभिषकर्मता हास्मै देहाय भवति, दुःखेन चिकित्सनीयोऽसौ देहो भवतीत्यर्थः । तस्मात् प्रसिद्ध्यापि स्वप्ने स्वयंज्योतिष्ट्वमस्य गम्यते । | नहीं हो सकता । जिस इन्द्रियद्वारदेशको—जिस देशसे कि वह शुक्र (इन्द्रियमात्रा) को लेकर हट गया था, उस इन्द्रियदेशको यह आत्मा फिर प्राप्त नहीं होता । इसीसे श्रुति कहती है, 'दुर्भिषज्यं हास्मै भवति' जिसे कि यह प्राप्त नहीं होता । जिस इन्द्रियद्वारदेशको—जिस देशसे कि यह शुक्र (इन्द्रियमात्रा) लेकर हट गया है, उस इन्द्रियदेशको यह आत्मा फिर प्राप्त नहीं होता । यदि कभी विपरीतरूपसे इन्द्रियमात्राओंको प्रविष्ट कर देता है तो अन्धत्व-बधिरत्व आदि दोषकी प्राप्ति होनेपर इस देहके लिये दुर्भिषज्य—कष्टकर वैद्यक्रिया हो जाती है, अर्थात् तब यह देह कठिनतासे चिकित्साके योग्य हो जाता है । अतः प्रसिद्धिसे भी स्वप्नमें इसकी स्वयंप्रकाशता ज्ञात होती है । |
| स्वप्नो भूत्वातिक्रान्तो मृत्यो रूपाणीति तस्मात् स्वप्ने स्वयंज्योतिरात्मा । अथो अपि खल्वन्य आहुः—जागरितदेश एवास्यैष यः स्वप्नः—न संध्यं स्थानान्तरमिहलोकपरलोकाभ्यां व्यतिरिक्तम्, किं तर्हि ? इह लोक एव जागरितदेशः । | यह स्वप्न होकर [शरीरादि] मृत्युके रूपोंसे पार हो जाता है, इसलिये स्वप्नमें आत्मा स्वयंज्योति है । इसीसे अवश्य ही कोई-कोई लोग कहते हैं कि यह जो स्वप्न है, इस आत्माका जागरितदेश ही है । इहलोक और परलोकसे भिन्न कोई संध्यस्थान नहीं है; तो फिर क्या है ? इहलोक अर्थात् जागरितदेश ही है । |