बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 96, कुल 1402 में से
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| ९० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
|---|
| संस्कृत-भाष्यम् | हिन्दी-अनुवाद |
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| असुरा ज्यायान्सोऽसुराः। स्वाभाविकी हि कर्मज्ञानप्रवृत्तिर्महत्तरा प्राणानां शास्त्रजनितायाः कर्मज्ञानप्रवृत्तेर्दृष्टप्रयोजनत्वात् । अत एव कनीयस्त्वं देवानां शास्त्रजनितप्रवृत्तेरल्पत्वात् । अत्यन्तयत्नसाध्या हि सा । | हो हैं। तथा असुरगण ज्यायस—ज्यायान् यानी अधिक हैं, क्योंकि दृष्ट प्रयोजनवाली होनेसे प्राणोंकी शास्त्रजनित कर्म-ज्ञानप्रवृत्तिकी अपेक्षा स्वाभाविक कर्म-ज्ञानप्रवृत्ति ही अधिकतर होती है। इसीसे शास्त्रजनित प्रवृत्तिकी अल्पताके कारण देवताओंकी भी अल्पता है, क्योंकि वह अत्यन्त यत्न करनेपर सिद्ध होनेवाली है। |
| ते देवाश्चासुराश्च प्रजापतिशरीरस्था एषु लोकेषु निमित्तभूतेषु स्वाभाविकेतरकर्मज्ञानसाध्येष्बु अस्पर्धन्त स्पर्धां कृतवन्तः। देवानां चासुराणां च वृत्त्युद्भवाभिभवौ स्पर्धा । कदाचिच्छास्त्रजनितकर्मज्ञानभावनारूपा वृत्तिः प्राणानामुद्भवति । यदा चोद्भवति तदा दृष्टप्रयोजना प्रत्यक्षानुमानजनितकर्मज्ञानभावनारूपा तेषामेव प्राणानां वृत्तिरासुर्यभिभूयते । स देवानां जयोऽसुराणां पराजयः। कदाचित्तद्विपर्ययेण देवानां वृत्तिरभिभूयत आसुर्या उद्भवः । सो- | प्रजापतिके शरीरमें रहनेवाले वे देव और असुर स्वाभाविक एवं अस्वाभाविक (शास्त्रजनित) कर्म और ज्ञानसे साध्य लोकोंके निमित्त स्पर्धा (डाह) करने लगे। दैवी और आसुरी वृत्तियोंका उठना और दबना ही देवता और असुरोंकी स्पर्धा है। कभी तो प्राणोंकी शास्त्रजनित कर्मज्ञानभावनारूपा वृत्ति उठती है, और जिस समय वह उठती है उस समय उन्हीं प्राणोंकी दृष्ट प्रयोजनवाली प्रत्यक्ष एवं अनुमानजनित कर्मज्ञानभावनारूपा आसुरी वृत्ति दब जाती है। यही देवताओंका जय और असुरोंका पराजय है। तथा कभी इसके विपरीत देवताओंकी वृत्ति दब जाता है और आसुरी वृत्तिका उत्थान |