बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 964, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ९५० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| कर्तृत्वमस्य कथञ्चिदुपपद्यते; कार्यकारणसंश्लेषेण हि कर्तृत्वं स्यात्; स च संश्लेषः सङ्गोऽस्य नास्ति, यतोऽसङ्गो ह्ययं पुरुषः; तस्मादमृतः। | किसी भी प्रकार इसे क्रियाका कर्तृत्व सम्भव नहीं है; देह और इन्द्रियोंके संश्लेषसे ही कर्तृत्व होता है और इस पुरुषको वह संश्लेष है नहीं, क्योंकि यह पुरुष असङ्ग है; अतः यह अमृत है। | | एवमेवैतद् याज्ञवल्क्य; सोऽहं भगवते सहस्रं ददामि; अत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव ब्रूहि; मोक्षपदार्थैकदेशस्य कर्मप्रविवेकस्य सम्यग्दर्शितत्वात्; अत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव ब्रूहीति ॥ १५ ॥ | [जनक—] याज्ञवल्क्य! यह बात ऐसी ही है; मैं श्रीमान्को सहस्र मुद्रा देता हूँ; अब आगे मोक्षके लिये ही वर्णन कीजिये; क्योंकि ऊपर मोक्षपदार्थके एकदेश कर्मविवेकका अच्छी तरह दिग्दर्शन करा दिया गया है, इसलिये अब आगे मोक्षके लिये ही वर्णन कीजिये ॥ १५ ॥ |
स्वप्नावस्थाके भोगोंसे आत्माकी असङ्गता
| तत्र 'असङ्गो ह्ययं पुरुषः' इत्यसङ्गताकर्तृत्वे हेतुरुक्तः; उक्तं च पूर्वम्—कर्मवशात् स ईयते यत्र काममिति; कामश्च सङ्गः; अतोऽसिद्धो हेतुरुक्तः—'असङ्गो ह्ययं पुरुषः' इति । <br><br> न त्वेतदस्ति; कथं तर्हि ? <br><br> असङ्ग एवेत्येतदुच्यते— | शङ्का—वहाँ (पूर्व मन्त्रमें) 'असङ्गो ह्ययं पुरुषः' इस वाक्यद्वारा असङ्गता ही अकर्तृत्वमें हेतु बतलायी गयी है और पहले यह भी कहा है कि यह कर्मवश जहाँ इसकी इच्छा होती वहीं चला जाता है, तथा इच्छा ही सङ्ग है, इसलिये 'क्योंकि यह पुरुष असङ्ग है' यह तो असिद्ध हेतु ही कहा गया है। <br><br> समाधान—ऐसी बात नहीं है; तो फिर यह असङ्ग ही किस प्रकार है ? सो बतलाया जाता है— |