बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 966, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ९५२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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जागरित-अवस्थाके भोगोंसे आत्माकी असङ्गता
| यथासौ स्वप्नेऽसङ्गतत्वात् स्वप्नसङ्गजैर्दोषैर्जागरिते प्रत्यागतो न लिप्यते, एवं जागरितसङ्गजैरपि दोषैर्न लिप्यत एव बुद्धान्ते; तदेतदुच्यते— | जिस प्रकार यह स्वप्नावस्थामें असङ्ग होनेके कारण जागरित-स्थानमें लौटनेपर उन स्वप्नसङ्ग-जनित दोषोंसे लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार जागरितअवस्थामें भी यह जागरितसङ्गजनित दोषोंसे लिप्त नहीं हो सकता—यही बात अब कही जाती है— |
स वा एष एतस्मिन् बुद्धान्ते रत्वा चरित्वा दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्याद्रवति स्वप्नान्तायैव ॥ १७ ॥
वह यह पुरुष इस जागरित-अवस्थामें रमण और विहार कर तथा पुण्य और पापको देखकर फिर जिस प्रकार आया था उसी मार्गसे यथास्थान स्वप्नस्थानको ही लौट जाता है ॥ १७ ॥
| स वा एष एतस्मिन् बुद्धान्ते जागरिते रत्वा चरित्वेत्यादि पूर्ववत् । स यत्तत्र बुद्धान्ते किञ्चित् पश्यत्यनन्वागतस्तेन भवति—असङ्गो ह्ययं पुरुष इति । | वह यह पुरुष इस बुद्धान्त-जागरित-स्थानमें रमण और विहार कर-इत्यादि अर्थ पूर्ववत् समझना चाहिये । वह उस जागरित-अवस्थामें जो कुछ देखता है, उससे असंश्लिष्ट रहता है, क्योंकि यह पुरुष असङ्ग है । | | ननु दृष्ट्वैवेति कथमवधार्यते ? करोति च तत्र पुण्यपापे; तत्फलं च पश्यति । | शङ्का-किंतु यह कैसे निश्चय किया जाता है कि वह उन्हें देख-कर ही [ लौट आता है ] ? वहाँ तो वह पुण्य-पापोंको करता भी है और उनका फल भी देखता है । | | न, कारकावभासकत्वेन कर्तृत्वोपपत्तेः; 'आत्मनैवायं ज्योतिषा | समाधान-ऐसी बात नहीं है, क्योंकि इसका कर्तृत्व कर्त्ता-कर्मादि कारकोंके अवभासकरूपसे ही है । 'यह पुरुष आत्मज्योतिके द्वारा ही |