बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 993, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्याथ | ९७९ |
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| परिव्राट्—यत्कर्मनिमित्तो भवति, स तेन विनिर्मुक्तत्वादश्रमणः; तथा तापसो वानप्रस्थोऽतापसः। सर्वेषां वर्णाश्रमादीनाम् उपलक्षणार्थमुभयोर्ग्रहणम् । | कर्मके कारण पुरुष परिव्राट् होता है, उससे मुक्त होनेके कारण वह अश्रमण हो जाता है तथा तापस यानी वानप्रस्थ अतापस हो जाता है। इन दोनोंका ग्रहण सम्पूर्ण वर्ण और आश्रमोंके उपलक्षके लिये है। | | किं बहुना ? अनन्वागतम्—नान्वागतमनन्वगतम् असम्बद्धमित्येतत्, पुण्येन शास्त्रविहितेन कर्मणा, तथा पापेन विहिताकरणप्रतिषिद्धक्रियालक्षणेन; रूपपरत्वान्नपुंसकलिङ्गम्; 'अभयं रूपम्' इति ह्यनुवर्तते । | अधिक क्या, वह पुण्य अर्थात् शास्त्रविहित कर्मसे अनन्वागत—असम्बद्ध रहता है तथा विहितका न करना और अविहितका - करनारूप पापसे भी असम्बद्ध रहता है; रूपपरक होनेके कारण अनन्वागतम् ऐसा नपुंसकलिंग प्रयोग किया गया है; क्योंकि 'अभयं रूपम्' इसकी यहां अनुवृत्ति की जाती है। | | किं पुनरसम्बद्धत्वे कारणम् ? इति तद्धेतुरुच्यते—तीर्णोऽतिक्रान्तः, हि यस्मात् एवंरूपः, तदा तस्मिन् काले सर्वाञ्छोकान्—शोकाः कामाः, इष्टविषयप्रार्थना हि तद्विषयवियोगे शोकत्वमापद्यते। इष्टं हि विषयमप्राप्तं वियुक्तं चोद्दिश्य चिन्तयानस्तद्गुणान् संतप्यते पुरुषः, अतः शोकोऽरतिः काम इति पर्यायाः । | किंतु उसको असम्बद्धतामें कारण क्या है ? सो उसका हेतु बतलाया जाता है—चूँकि उस समय इस प्रकारका यह पुरुष सम्पूर्ण शोकोंको पार कर जाता है; शोक अर्थात् काम, क्योंकि इष्ट विषयकी प्रार्थना ही उस विषयका वियोग होनेपर शोकरूप हो जाती है। अप्राप्त अथवा वियुक्त हुए इष्टविषयके उद्देश्यसे उसके गुणोंका चिन्तन करनेवाला पुरुष संतप्त होता है, इसलिये शोक, अरति, काम-ये पर्याय शब्द हैं। |