भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 995, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 995

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ९८१


इत्युक्तत्वात् । वक्ष्यति च-- "कामा येऽस्य हृदि श्रिताः" (४।४।७) इति ।मन ही है" ऐसा कहा गया है। तथा "जो काम इसके हृदयमें आश्रित हैं" ऐसा श्रुति कहेगी भी।
आत्मसंश्रयभ्रान्त्यपनोदाय हीदं वचनम्, हृदि श्रिता हृदयस्य शोका इति च हृदयकरणसम्बन्धातीतश्चायमस्मिन् काले "अतिक्रामति मृत्यो रूपाणि" (४।३।७) इति ह्युक्तम् । हृदयकरणसम्बन्धातीतत्वात्, तत्संश्रयकामसम्बन्धातीतो भवतीति युक्ततरं वचनम् ।'हृदि श्रिताः' 'हृदयस्य शोकाः' ये वचन शोकादिके आत्माश्रयत्वकी भ्रान्तिका निराकरण करनेके लिये हैं। इस सुषुप्तावस्थामें यह पुरुष हृदयरूप इन्द्रियके सम्बन्धसे परे हो जाता है, जैसा कि "यह मृत्युके रूपोंको पार कर जाता है" इस वाक्यद्वारा कहा गया है, अतः हृदयेन्द्रियके सम्बन्धसे अतीत होनेके कारण यह हृदयाश्रित कामके सम्बन्धसे परे हो जाता है—यह कथन उचित ही है।
(सविशेषात्मवाद-निराकरणम्)<br>ये तु वादिनो हृदि श्रिताः कामा वासनाश्च हृदयसम्बन्धिनमात्मानमुपसृप्योपश्लिष्यन्ति, हृदयवियोगेऽपि च आत्मन्यवतिष्ठन्ते पुटतैलस्थ इव पुष्पादि गन्ध इत्याचक्षते, तेषां "कामः संकल्पः" (१।५।३) "हृदये ह्येव रूपाणि" (३।९।२०) "हृदयस्य शोकाः" इत्यादीनां वचनानामानर्थक्यमेव ।किंतु जो [भर्तृप्रपञ्चादि] मतवादी ऐसा कहते हैं कि हृदयमें स्थित काम और वासनाएँ हृदयसम्बन्धी आत्माके पास जाकर उसका आलिङ्गन करती हैं तथा हृदयका वियोग हो जानेपर भी पुटतैलमें स्थित पुष्पादिके गन्धके समान वे आत्मामें विद्यमान रहती हैं, उनके लिये तो "कामः संकल्पः" "हृदये ह्येव रूपाणि" "हृदयस्य शोकाः" इत्यादि वाक्योंकी व्यर्थता ही है।
हृदयकरणोत्पाद्यत्वादिति चेद्, न, 'हृदि श्रिताः' इतियदि कहो कि कामादि हृदयरूप करणसे उत्पाद्य होनेके कारण [हृदयसे सम्बद्ध हैं] तो यह ठीक नहीं, क्योंकि 'हृदि श्रिताः' (हृदयमें स्थित)