सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 1007, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1007

६८८ नारदीयपुराणम् चतुर्वर्गप्रदं नृणां कोन्वस्तत्समो गुरुः । कायेन मनसा वाचा धनाद्यैरपि संततम् ॥४०॥ प्रियं समाचरेत्तस्य गुरोर्द्धर्मोपदेशिनः । श्रुत्वा पुराणं विधिवद्धोमं कृत्वा सुरार्चनम् ॥४१॥ ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चाच्छतं मिष्टान्नपायसैः । दक्षिणां प्रददेच्छक्त्या भक्त्या प्रीयेत माधवः ॥४२॥ यथा श्रेष्ठा नदी गंगा पुष्करं च सरो यथा । काशी पुरी नवं मेरुर्देवो नारायणो हरिः ॥४३॥ कृतं युगं सामवेदो धेनुर्विप्रोऽन्नमंबु च । मार्गा मृगेंद्रः पुक्षोऽश्वत्थः प्रह्लाद आननम् ॥४४॥ उच्चैःश्रवा वसंतश्च जपः शेषोऽर्यमा धनुः । पावको विष्णुरिंद्रश्च कपिलो वाक्पतिः कविः ॥४५॥ अर्जुनो हनुमान्धर्मश्चित्तं चित्ररथोऽम्बुजम् । उर्वशी कांचनं यद्वच्छ्रेष्ठाश्चैते स्वजातिषु ॥४६॥ तथैव नारदीयं तु पुराणेषु प्रकीर्तितम् । शांतिरस्तु शिवं चास्तु सर्वेषां वो द्विजोत्तमाः ॥४७॥ गमिष्यामि गुरोः पार्श्वं व्यासस्यामिततेजसः । इत्युक्त्वाभ्यर्चितः सूतः शौनकाद्यैर्महात्मभिः ॥४८॥ आपृष्टश्च पुनः सर्वैर्दर्शनार्थं गुरोर्ययौ । तेऽपि सर्वे द्विजश्रेष्ठाः शौनकाद्याः समाहिताः ॥४९॥ श्रुतं सम्यगनुष्ठाय तत्र तस्थुश्च सत्रिणः ॥४९॥ कलिकल्मषविषनाशनं हरिं यो जपपूजनविधिमेवजोषसेवी । स तु निर्विषमनसा समेत्य यागं लभते सततप्रभीप्सितं हि लोकम् ॥५०॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे पुराणसंहितावर्णनं नाम पंचविंशोत्तरशततमोऽध्यायः ॥१२५॥ वाले धर्मसंग्रहभूत पुराण का उपदेश करता है, उसके समान अन्य कोई गुरु नहीं होता ! शरीर, मन, वाणी तथा धन आदि से प्रिय आचरण करना चाहिए ॥३३-४०३॥ पुराणश्रवणानन्तर विधिवूवर्क हवन तथा देवार्चन करके सौ ब्राह्मणों को मधुर तथा खीर खिलाये। पश्चात् उन्हें भक्तिपूर्वक दक्षिणा दे; क्योंकि भक्ति से माधव प्रसन्न होते हैं। जैसे नदियों में गंगा, सरोवरों में पुष्कर, पुरियों में काशी, पर्वतों में मेरु, देवों में नारायण, युगों में सत्ययुग, वेदों में सामवेद और अपनी अपनी जातियों में धेनु, विप्र, अन्न, जल, योग, सिंह, सारस, हंसों में प्रह्लाद, मुख, उच्चैःश्रवा, वसंत, जप, अनंतशेष, अर्यमा, धनु, पावक, विष्णु, इंद्र, कपिल, बृहस्पतिः होता रहता है, हनुमान्, कुश, चित्त, चित्ररथ, कमल, उर्वशी तथा सुवर्ण श्रेष्ठ हैं, उसी तरह समस्त पुराणों में नारदीयपुराण श्रेष्ठ है। द्विजवर्यवृन्द ! आप लोगों का कल्याण हो, शान्ति मिले ! अब मैं अमिततेजस्वी गुरु व्यास के समीप जाऊँगा ।४१-४७३॥ इतना कहकर, महात्मा शौनक आदि से संमानित हो, पुनः उनसे विदा ले, गुरु के दर्शनार्थ सूतजी चले गये । शौनक आदि द्विजवर भी सावधान होकर सुने हुए पुराण के अनुसार यज्ञानुष्ठान में प्रवृत्त हुए। जो व्यक्ति कलि-पातक रूप विष को नष्ट करने वाले हरि के जप-पूजन रूप ओषधि का सेवन करता है, वह विष (पाप) रहित मन से सतत याग (के पुण्य) को प्राप्त कर मनोवांछित लोक को जाता है ॥४८-५०॥ श्री नारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में पुराण-महिमा-वर्णन नामक एकसौ पच्चीसवां अध्याय समाप्त ॥१२५॥ (नारदीयपुराण का पूर्वभाग समाप्त)