भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 164, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 164

विंशोऽध्यायः १४५ एकाकी दुःखबहुलो न्यवसन्निर्जने वने । एकदा क्षुत्परिश्रान्तो निदाघार्त्तः पिपासितः ॥३३॥ जीर्णं देवालयं विष्णोरपश्यं विजने वने । हंसकारण्डवाकीर्णं तत्समीपे महत्सरः ॥३४॥ पर्यन्तवनपुष्पौघच्छादितं तन्मुनीश्वर । अपिबं तत्र पानीयं तत्तीरे विगतश्रमः ॥३५॥ फलानि जग्ध्वा शीर्णानि स्वयं क्षुच्च निवारिता । तस्मिञ्जीर्णालये विष्णोर्निवासं कृतवानहम् ॥३६॥ जीर्णस्फुटितसंधानं तस्य नित्यमकारिषम् । पर्णैस्तृणैश्च काष्ठौघैर्गृहं सम्यक् प्रकल्पितम् ॥३७॥ स्वसुखार्थं तु तद्भूमिर्मया लिप्ता मुनीश्वर । तत्राहं व्याधवद्वृत्तिस्थो हत्वा बहुविधान्मृगान् ॥३८॥ आजीवं वर्तयन्नित्यं वर्षाणां विंशतिः स्थितः । अथेयमागता साध्वी विन्ध्यदेशसमुद्भवा ॥३६॥ निषादकुलजा विप्र नाम्ना ख्यातावकोकिला । बन्धुवर्गपरित्यक्ता दुःखिता जीर्णविग्रहा ॥४०॥ क्षुत्तृड्घर्मपरिश्रान्ता शोचन्ती स्वकृतं ह्यघम् । दैवयोगात्समायाता भ्रमन्ती विजने वने ॥४१॥ ग्रीष्मतापार्दिता बाह्य स्वान्ते चार्धिनिपीडिता । इमां दुःखार्दितां दृष्ट्वा जाता मे विपुला दया ॥४२॥ दत्तं मया जलं चास्यै मांसं वन्यफलानि च । गतश्रमा त्वियं ब्रह्मन्मया पृष्टा यथातथम् ॥४३॥ अवेदयत्स्ववृत्तान्तं तच्छृणुष्व महामुने । नाम्नावकोकिला चाहं निषादकुलसम्भवा ॥४४॥ दारुकस्य सुता चाहं विन्ध्यपर्वतवासिनी । परस्वहारिणी नित्यं सदा पैशुन्यवादिनौ ॥४५॥ पुंश्चलीत्येवमुक्त्वा तु बन्धुवर्गैः समुज्झिता । कियत्कालं ततः पत्या भृताहं लोकनिन्दिता ॥४६॥ दैवात्सोऽपि गतो लोकं यमस्यात्र विहाय माम् । कान्तारे विजने चैका भ्रमन्ती दुःखपीडिता ॥४७॥ दैवात्तत्सविधं प्राप्ता जीविताहं त्वयाधुना । इत्येवं स्वकृतं कर्म मह्यं सर्वं न्यवेदयत् ॥४८॥ से संतप्त और थका हुआ सा इधर-उधर घूम रहा था, इतने में उस निर्जन वन में एक विष्णु का टूटा हुआ मन्दिर दिखलायी दिया ॥३१-३३॥ उसके समीप ही हंस और कारंडव पक्षियों से सुशोभित एक महान् सरोवर था। मुनीश्वर ! उसका तट प्रदेश वन्य पुष्पों से आच्छादित था। वहाँ मैंने पानी पिया और तीर पर बैठकर सारी थकावट दूर की। भूमि पर गिरे पके फलों को खाकर अपनी भूख मिटाई। उस जीर्ण शीर्ण देव-मन्दिर में मैंने अपना निवास-स्थान बनाया ॥३४-३६॥ प्रतिदिन उसकी जीर्ण और फटी दरारों को स्वयं जोड़ना प्रारम्भ किया। पत्तियों, घासों और लकड़ियों से एक अच्छा घर भी बना लिया। मुनीश्वर ! अपने सुख के लिए उस भूमि को लीप पोत कर रहने के योग्य बनाया। वहाँ मैं व्याध को भाँति अनेक प्रकार के पशुओं को मारकर अपनी जीविका चलाता था, इस प्रकार वहाँ रहकर बीस वर्ष बिताये । विप्र ! इसके अनन्तर विन्ध्य प्रदेश की रहने वाली, निषाद कुल की यह साध्वी जिसका नाम अवकोकिला था—आई । अपने बन्धु जनों से छोड़ी हुई, दुःखी, दुबली-पतली, भूख-प्यास और धूप से व्याकुल, अपने किये पापों पर पश्चात्ताप करती हुई दैव योग से उस विजन वन में घूमती हुई वहाँ आई ॥३७-४१॥ उस समय धूप से जली हुई वह स्त्री शारीरिक और मानसिक पीड़ा से अत्यन्त पीड़ित थी। दुःख से पीड़ित इसको देखकर मुझे बड़ी दया आई। मैंने इसको पानी, मांस और जंगली फलों को खाने के लिए दिया। ब्रह्मन् ! जब इसकी थकावट दूर हो गई तब इससे जो कुछ पूछा और इसने जो कुछ अपना वृत्तान्त कहा उसको उसी रूप में कह रहा हूँ महामुने ! उसको सुनिए ॥४२-४४॥ मैं निषाद कुल में उत्पन्न हुई हूँ, मेरा नाम अवकोकिला है, मैं दारुक की पुत्री हूँ और विन्ध्य पर्वत पर निवास करती हूँ। पहले मैं सर्वदा चुगली खाती और दूसरे के धन को चुराया करती थी । परिवार वालों ने मुझे पुंश्चली कह कर घर से अलग कर दिया। कुछ समय तक पति ने लोक-निन्दित मेरा भरण-पोषण किया। दैव योग से वह भी यहाँ मुझको अकेली छोड़कर यमलोक को चला गया। मैं दुःखी अकेली इस विजन वन में भटकती हुई दैव योग से यहाँ आपके पास आई हूँ, आपने मुझे इस समय जीवन दान दिया, इस प्रकार इसने अपने किये हुए सब कर्मों को मुझसे कह सुनाया ॥४५-४८॥ इसके अनन्तर हम दोनों उस देव-मन्दिर में दम्पति बन कर दस १९--नारदीयपुराणम्