भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 21, कुल 1008 में से

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२ प्रथमोऽध्यायः गृणन्तः परमं ब्रह्म जगच्चक्षुः समौजसः । धर्मशास्त्रार्थतत्त्वज्ञास्तेपुनैमिषकानने ॥७॥ यज्ञैर्यज्ञपतिं केचिज्ज्ञानैर्ज्ञानात्मकं परे । केचिच्च परया भक्त्या नारायणमपूजयन् ॥८॥ एकदा ते महात्मानः समाजं चक्रुरुत्तमाः । धर्मार्थकाममोक्षाणामुपायाञ्ज्ञातुमिच्छवः ॥६॥ षड्िंवशतिसहस्राणि मुनीनामूर्ध्वरेतसाम् । तेषां शिष्यप्रशिष्याणां संख्या वक्तुं न शक्यते ॥१०॥ मुनयो भावितात्मानो मिलितास्ते महौजसः । लोकानुग्रहकर्त्तारो वीतरागा विमत्सराः ॥११॥ कानि क्षेत्राणि पुण्यानि कानि तीर्थानि भूतले । कथं वा प्राप्यते मुक्तिर्नृणां तापार्तचेतसाम् ॥१२॥ कथं हरौ मनुष्याणां भक्तिरव्यभिचारिणी । केन सिध्येत च फलं कर्मणस्त्रिविधात्मनः ॥१३॥ इत्येवं प्रष्टुमात्मानमुद्यतान्प्रेक्ष्य शौनकः । प्राञ्जलिर्वाक्यमाहेदं विनयावनतः सुधीः ॥१४॥ शौनक उवाच आस्ते सिद्धाश्रमे पुण्ये सूतः पौराणिकोत्तमः । यजन्मुखैर्बहुविधैर्विश्वरूपं जनार्दनम् ॥१५॥ स एतदखिलं वेत्ति व्यासशिष्यो महामुनिः । पुराणसंहितावक्ता शान्तो वै रोमहर्षणिः ॥१६॥ युगे युगेऽल्पकान्धर्मान्निरोक्ष्य मधुसूदनः । वेदव्यासस्वरूपेण वेदभानं करोति वै ॥१७॥ वेदव्यासमुनिः साक्षान्नारायण इति द्विजाः । शुश्रुमः सर्वशास्त्रेषु सूतस्तु व्यासशासितः ॥१८॥ तेन संशासितः सूतो वेदव्यासेन धीमता । पुराणानि स वेत्त्येव नान्यो लोके ततः परः ॥१६॥ स पुराणार्थविल्लोके स सर्वज्ञः स बुद्धिमान् । स शान्तो मोक्षधर्मज्ञः कर्मभक्तिकलापवित् ॥२०॥ इस प्रकार धर्मशास्त्रों के अर्थ एवं रहस्य को जानने वाले, सर्वदा परब्रह्म की स्तुति में ही लीन रहने वाले, सर्वद्रष्टा और समान ओज रखने वाले ऋषि उस नैमिषकानन में तपोरत थे ॥७॥ उनमें से कुछ तो यज्ञों के द्वारा यज्ञपति की, कुछ ज्ञान के द्वारा ज्ञानस्वरूप ब्रह्म की और कुछ ऋषि अपनी पराभक्ति के द्वारा नारायण की उपासना करते थे ॥८॥ एक दिन उन महात्मा मुनियों ने धर्म-अर्थ काम और मोक्ष की प्राप्ति के साधनों को जानने की इच्छा से एक गोष्ठी का आयोजन किया। उस गोष्ठी में छब्बीस हजार ऊर्ध्वरेता, जिनके शिष्योपशिष्यों की संख्या नहीं कही जा सकती, एवं अन्यान्य महातेजस्वी और ज्ञानी मुनि सम्मिलित हुए। वे लोककल्याणकर्त्ता, वीत-राग और ईर्ष्यारहित मुनि-इस भूतल पर कौन-कौन से पवित्र तीर्थ ओर पुण्यदायक क्षेत्र हैं, अथवा त्रिविधताप से संतप्त मनुष्यों को कैसे मुक्ति मिल सकती है, किस प्रकार श्री विष्णु में मनुष्यों की अचल भक्ति हो सकती है और किस उपाय से त्रिविध कर्म (दैविक, दैहिक और आध्यात्मिक, अथवा कायिक, वाचिक और मानसिक) सफल हो सकते हैं, आदि प्रश्नों को महर्षि शौनक से पूछने के लिए उद्यत हुए। उन्हें देखकर विनयावनत सुधी शौनक ने हाथ जोड़कर कहा ॥ ६—१४॥ शौनक बोले- 'सभ्यगण ! पुनीत सिद्ध आश्रम में महान् पुराण विद्या के ज्ञाता सूत जी रहते हैं। वे बहुविध यज्ञों में विश्वरूप जनार्दन की अराधना किया करते हैं। वे ही व्यास के प्रिय शिष्य, पुराण संहिता के वक्ता, शान्त, महामुनि रोमहर्षण जी इन सम्पूर्ण तत्त्वों को जानते हैं। युग-युग में धर्म का ह्रास देखकर स्वयं मधुसूदन वेदव्यास के रूप में अवतार लेकर वेदों का विभाग करते हैं। द्विजगण ! मुनि वेदव्यास साक्षात् नारायण हैं। सुना जाता है कि कृपालु व्यास जी ने सूत को सब शास्त्रों का उपदेश किया है। जब उन्ही धीमान् वेदव्यास जी ने सूत को शास्त्रों का उपदेश किया है तो मैं यह कह सकता हूँ कि इस लोक में वे ही पुराणों को जानते हैं। उनसे बढ़कर दूसरा कोई पुराणविद् नहीं है। वे ही इसलोक में पुराण के तत्त्वज्ञाता हैं। वे ही सर्वज्ञ ओर वे ही बुद्धिमान्

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