बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंत्रयस्त्रिंशोऽध्यायः २१५ चांद्रायणादिभिर्यत्र शरीरस्य विशोषणम् । तपो निगदितं सद्भिर्योगसाधनमुत्तमम् ॥८८॥ प्रणवस्योपनिषदां द्वादशार्णस्य च द्विज । अष्टाक्षरस्य मंत्रस्य महावाक्यचयस्य च ॥८९॥ जपः स्वाध्याय उदितो योगसाधनमुत्तमम् । स्वाध्यायं यस्त्यजेन्मूढस्तस्य योगो न सिध्यति ॥९०॥ योगं विनापि स्वाध्यायात्पापनाशो भवेन्नृणाम् । स्वाध्यायैस्तोष्यमाणाश्च प्रसीदंति हि देवताः ॥९१॥ जपस्तु त्रिविधः प्रोक्तो वाचिकोपांशुमानसः । त्रिविधेऽपि च विप्रेन्द्र पूर्वात्पुवत्परो वरः ॥९२॥ मंत्रस्योच्चारणं सम्यक्स्फुटाक्षरपदं यथा । जपस्तु वाचिकः प्रोक्तः सर्वयज्ञफलप्रदः ॥९३॥ मंत्रस्योच्चारणे किंचित्पदात्पदविवेचनम् । स तूपांशर्जपः प्रोक्तः पूर्वस्माद्द्विगुणोऽधिकः ॥९४॥ विधाय हृद्यक्षरश्रेण्यां तत्तदर्थविचारणम् । स जपो मानसः प्रोक्तो योगसिद्धिप्रदायकः ॥९५॥ जपेन देवता नित्यं स्तुवतः संप्रसीदति । तस्मात्स्वाध्यायसंपन्नो लभेत्सर्वान्मनेारथान् ॥९६॥ यदृच्छालाभसंतुष्टिः संतोष इति गीयते । संतोषहीनः पुरुषो न लभेच्छर्म कुत्रचित् ॥९७॥ न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति । इतोऽधिकं कदा लप्स्य इति कामस्तु वर्द्धते ॥९८॥ तस्मात्कामं परित्यज्य देहसंशोषकारणम् । यदृच्छालाभसंतुष्टो भवेद्धर्मपरायणः ॥९९॥ बाह्याभ्यन्तरभेदेन शौचं तु द्विविधं स्मृतम् । मृज्जलाभ्यां बहिः शुद्धिर्भावशुद्धिस्तथान्तरम् ॥१००॥ अन्तःशुद्धिविहीनस्तु येऽध्वरा विविधाः कृताः । न फलंति मुनिश्रेष्ठ भस्मनि न्यस्तहव्यवत् ॥१०१॥ भावशुद्धिविहीनानां समस्तं कर्म निष्फलम् । तस्माद्रागादिकं सर्वं परित्यज्य सुखी भवेत् ॥१०२॥ मृदा भारसहस्रैस्तु कुम्भकोटिजलैस्तथा । कृतशौचोऽपि दुष्टात्मा चंडालसदृशः स्मृतः ॥१०३॥ चान्द्रायण आदि व्रत द्वारा शरीर के शोषण को महात्माओं ने उत्तम योग साधन और तप कहा है ॥८८॥ ओंकार उपनिषद्, द्वादशाक्षर मन्त्र, अष्टाक्षर मन्त्र और जिस (सम्प्रदाय) के जो महावाक्य हैं, उनका जप ही स्वाध्याय है जो कि उत्तम योग साधन है । जो मूढ़ स्वाध्याय का त्याग कर देता है उसका योग कभी भी सिद्ध नहीं होता ॥८९-९०॥ बिना योग के भी केवल स्वाध्याय से मनुष्यों के पाप नष्ट हो जाते हैं । स्वाध्याय के द्वारा जिन देवताओं की स्तुति की जाती है, वे अवश्य प्रसन्न होते हैं ॥९१॥ जप, वाचिक उपांशु, और मानस भेद से तीन प्रकार का होता है। इस त्रिविध जप में पूर्वपेक्षा पर श्रेष्ठ माना गया है ॥९२॥ जिस जप में मन्त्र के अक्षरों, पदों का स्फुट रूप से भलीभाँति उच्चारण किया जाता है उसको वाचिक जप कहा जाता है, ऐसा जप सब यज्ञों के फल को देने वाला है । जिस जप में मन्त्रोच्चारण करते समय मंत्रपदों का कुछ विवेचन किया जाता है उसको उपांशु जप कहते हैं । यह पूर्व वाचिक जप से दुगुना अधिक फल देने वाला है । अक्षरों की पृथक्-पृथक् श्रेणी बनाकर उसके अर्थों पर ध्यान देकर मन में ही जप करना मानस जप कहा है। यह जप योगसिद्धि को देने वाला है । जप द्वारा देवताओं की स्तुति करने पर देवता शीघ्र प्रसन्न होते हैं । इसलिए स्वाध्याय करने वाला व्यक्ति अपने सब मनोरथों को प्राप्त करता है ॥८३-९६॥ जो कुछ मिल जाय उसी पर प्रसन्न रहना सन्तोष कहा जाता है । संतोष हीन व्यक्ति कभी और कहीं सुख नहीं पा सकता ॥९७॥ विषयोपभोग से कभी भी इच्छा-तृप्ति नहीं होती । इसमें तो 'इससे अधिक कब प्राप्त करूंगा' ऐसी इच्छा बनी ही रहती है, जिससे दिनों दिन काम (इच्छा) बढ़ता ही रहता है । इसलिए देह को सुखा देने वाले को छोड़कर सर्वदा श्रम से जो कुछ मिल जाय उसी पर सन्तोष करना चाहिए ॥९८-९९॥ बाह्य और आभ्यन्तर भेद से शौच दो प्रकार का होता है । मिट्टी और जल से की हुई शुद्धि बाह्य- शुद्धि और भावशुद्धि आभ्यन्तर शुद्धि है ॥१००॥ मुनिश्रेष्ठ ! अन्तःशुद्धि विहीन मनुष्यों के किए हुए विविध-यज्ञ राख में दी हुई आहुति की भाँति कभी भी फलदायक नहीं होते ॥१०१॥ बिना भावशुद्धि के सभी कर्म निष्फल हो जाते हैं । इस लिए रागादि का परित्याग करके ही मनुष्य सुखी होता है ॥१०२॥ हजारों मन मिट्टी और करोड़ों घड़ों के जल से शुद्धि करने पर भी दुष्टात्मा व्यक्ति चाण्डाल के समान ही माना जाता