भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 255, कुल 1008 में से

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२३६ नारदीयपुराणम् अन्यश्रेयोविनाशार्थं येऽर्चयंति जनार्दनम् । सा पूजैव महाभाग पूजकामाशु हंति वै ॥७॥ हरिपूजाकरो यस्तु यदि पापं समाचरेत् । तमेव विष्णुद्वेष्टारं प्राहुस्तत्त्वार्थकोविदाः ॥८॥ ये विष्णुनिरताः संति लोकानुग्रहतत्पराः । धर्मकार्यरताः शश्वद्विष्णुरूपास्तु ते मताः ॥६॥ कोटिजन्मार्जितैः पुण्यैर्विष्णुभक्तिः प्रजायते । दृढभक्तिमतां विष्णौ पापबुद्धिः कथं भवेत् ॥१०॥ जन्मकोटयर्जितं पापं विष्णुपूजारतात्मनाम् । क्षयं याति क्षणादेव तेषां स्यात्पापधीः कथम् ॥११॥ विष्णुभक्तिविहीना ये चंडालाः परिकीर्तिताः । चंडाला अपि वै श्रेष्ठाः हरिभक्तिपरायणाः ॥१२॥ नराणां विषयांधानां सर्वदुःखविनाशिनी । हरिसेवेति विख्याता भुक्तिमुक्तिप्रदायिनी ॥१३॥ संगात्स्नेहाद्भयाल्लोभादज्ञानाद्वापि यो नरः । विष्णोरुपासनं कुर्यात्सोऽक्षयं सुखमश्नुते ॥१४॥ हरिपादोदकं यस्तु कणमात्रं पिबेदपि । स स्नातः सर्वतीर्थेषु विष्णोः प्रियतरो भवेत् ॥१५॥ अकालमृत्युशमनं सर्वव्याधिविनाशनम् । सर्वदुःखोपशमनं हरिपादोदकं स्मृतम् ॥१६॥ नारायणं परं धाम ज्योतिषां ज्योतिरुत्तमम् । ये प्रपन्ना महात्मानस्तेषां मुक्तिर्हि शाश्वती ॥१७॥ अत्राप्युदाहरंतीममितिहासं पुरातनम् । पठतां शृण्वतां चैव सर्वपापप्रणाशनम् ॥१८॥ आसीत्पुरा कृतयुगे गुलिको नाम लुब्धकः । परदारपरद्रव्यहरणे सततोग्यतः ॥१६॥ परनिंदापरो नित्यं जन्तूपद्रवकृत्तथा । हतवान्ब्राह्मणान् गाश्च शतशोऽथ सहस्रशः ॥२०॥ देवस्य हरणे नित्यं परस्वहरणे तथा । उद्यक्तः सर्वदा विप्र कीनाशानामधीश्वरः ॥२१॥ पूजा विफल होती है ॥६॥ अन्य लोगों के कल्याण के विनाश के लिए जो भगवान् की पूजा करता है वह पूजा ही उस पूजक को नष्ट कर देती है ॥७॥ हरि पूजा करने वाला व्यक्ति यदि पापाचरण करता है, उसी को तत्त्वज्ञ जन विष्णु-द्वेष्टा कहते हैं ॥८॥ जो विष्णु की सेवा में तथा लोक कल्याण में तत्पर रहकर धर्म संपादन करते हैं, उनको विष्णु रूप ही जानना चाहिए ॥६॥ करोड़ों जन्मों के संचित पुण्य के प्रभाव से ही विष्णु भक्ति प्राप्त होती है, और जिनकी विष्णु में दृढ़ भक्ति होगी उनको पापों की ओर प्रवृत्ति कैसे होगी ? ॥१०॥ विष्णु पूजा में सर्वदा लीन रहने वाले व्यक्ति के कोटि जन्म के पाप स्वतः तत्काल नष्ट हो जाते हैं । तब उनके मन में पाप वासना कैसे रह सकती है ? ॥११॥ जो विष्णु भक्ति से विमुख हैं वे चाण्डाल कहे जाते हैं, और चाण्डाल भी यदि विष्णु भक्ति में लगा रहता है तो वह श्रेष्ठ है ॥१२॥ विषयान्य मनुष्यों के सब दुःखों को दूर करने वाली और उनको भुक्ति और मुक्ति देने वाली हरि-सेवा ही है यह लोक-प्रसिद्ध है ॥१३॥ साहचर्य, स्नेह, भय, लोभ अथवा अज्ञान से भी जो मनुष्य विष्णु की उपासना करता है वह अक्षय सुख का उपभोग करता है ॥१४॥ जो व्यक्ति विष्णु-पादोदक का एक बिन्दु भी पी लेता है वह सब तीर्थों में स्नान करने का फल पाता है और वह विष्णु का प्रिय बन जाता है ॥१५॥ विष्णु का चरण-जल सब दुःखों को दूर करने वाला, अकाल मृत्यु से बचाने वाला और सब व्याधियों से मुक्त करने वाला है ॥१६॥ जो पर धाम, उत्तम प्रकाश, भगवान् नारायण की शरण में जाते हैं वे महात्मा अवश्य शाश्वत पद पा जाते हैं ॥१७॥ इस विषय में एक पुरातन इतिहास सुना रहा हूँ, जिसके पाठ और श्रवण से सब पाप अनायास नष्ट हो जाते हैं ॥१८॥ आज से बहुत पहले कृत युग में गुलिक नामक एक व्याध रहता था । वह सदा दूसरे का धन और स्त्रियाँ छीन लिया करता था ॥१६॥ नित्य प्रति दूसरे की निन्दा करने वाले और जन्तुओं को आतंकित करने वाले उस व्याध ने सैकड़ों, हजारों गायों और ब्राह्मणों की हत्या की थी ॥२०॥ वह यमराज देव-संपत्ति और दूसरे मनुष्यों के धन को लूटने के लिए सदा तैयार रहता था ॥२१॥

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