भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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२५२ नारदीयपुराणम् समागतं देवपतिं बृहस्पतिसमन्वितम् । दृष्ट्वा यथाहं देवर्षे पूजायामास सादरम् ॥११॥ सुधर्मणार्चितः शक्रो दृष्ट्वा तच्छ्रियमूत्तमाम् । मनसा विस्मयाविष्टः प्रोवाच विनयान्वितः ॥१२॥ इन्द्र उवाच अतीतब्रह्मकल्पस्य वृत्तांतं वेत्सि चेद्बुध । तदाख्याहि सकायात एतत्प्रष्टुं समाजिकः ॥१३॥ गतनिद्रांश्च देवांश्च येन जानासि सुव्रत । तद्वदस्वाधिकः कस्मादस्मद्भभोऽपि दिवि स्थितः ॥१४॥ तेजसा यशसा कीर्त्या ज्ञानेन च परंतप । दानेन वा तपोभिर्वा कथमेतादृशः प्रभो ॥१५॥ इत्युक्तो देवराजेन सुधर्मा प्रहसंस्तदा । प्रोवाच विनयाविष्टः पूर्ववृत्तं यथाविधि ॥१६॥ सुधर्म उवाच चतुर्युगसहस्राणि ब्रह्मणो दिनमुच्यते । एकस्मिन् दिवसे शक्र मनवश्च चतुर्दश ॥१७॥ इंद्राश्चतुर्दश प्रोक्ता देवाश्च विविधाः पृथक् । इंद्राणां चैव सर्वेषां मन्वादीनां च वासव ॥१८॥ तुल्यता तेजसा लक्ष्म्या प्रभावेण बलेन च । तेषां नामानि वक्ष्यामि शृणुष्व सुसमाहितः ॥१९॥ स्वायंभुवो मनुः पूर्वं ततः स्वारोचिषस्तथा । उत्तमस्तामसश्चैव रैवतश्चाक्षुषस्तथा ॥२०॥ वैवस्वतो मनुश्चैव सूर्यसावर्णिराष्टमः । नवमो दक्षसावर्णिः सर्वदेवहिते रतः ॥२१॥ दशमो ब्रह्मसावर्णिर्धर्मसावर्णिकस्ततः । ततस्तु रुद्रसावर्णी रोचमानस्ततः स्मृतः ॥२२॥ भौत्यश्चतुर्दशः प्रोक्त एते हि मनवः स्मृताः । देवानिंद्रांश्च वक्ष्यामि शृणुष्व विबुधर्षभ ॥२३॥ लेकर सुधर्म के घर पर गया ॥८-१०॥ देवर्षि नारद ! इन्द्र को बृहस्पति के साथ अपने घर पर आया हुआ देखकर उसने आदरपूर्वक यथायोग्य सब की पूजा की ॥११॥ सुधर्म का सम्मान और आतिथ्य ग्रहण करने के बाद, उसके उत्तम वैभव को देखकर इन्द्र को मन ही मन बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने विनयभाव से पूछा ॥१२॥ इन्द्र बोले- हे बुद्धिमन् ! यदि तुम अतीत कल्प की बातें जानते हो तो कहो। यही बात पूछने के लिए मैं गुरु के साथ आया हूँ। सुव्रत ! जिस कारण तुम निद्रा को जीतने वाले देवों को जानते हो उसको कहो। यह भी बताओ कि कौन ऐसा महान तप है जिसके कारण इस स्वर्ग में रहकर भी तुम हम सबों से श्रेष्ठ समझे जाते हो ॥१३-१४॥ शत्रुंजय ! तेज, यश, कीर्ति, ज्ञान, दान या तप इनमें से किसके प्रभाव से तुम इस प्रकार श्रेष्ठ हो गए ॥१५॥ देवराज इन्द्र की कही हुई इन बातों को सुनकर सुधर्मा हँसने लगा। उसने बड़ी विनयता से पूर्व की बीती हुई घटनाओं को यथाविधि कहना प्रारम्भ किया। १६॥ सुधर्मा ने कहा-सहस्र चतुर्युग ब्रह्मा का एक दिन है। इन्द्र ! ब्रह्मा के एक दिन में चौदह मनु होते हैं ॥१७॥ इन्द्र भी चौदह ही हैं। देवता तो पृथक्-पृथक् अनेकों हैं। वासव ! इन्द्र और सब मनु लक्ष्मी, तेज, प्रभाव और बल में समान ही होते हैं। अब मन्वन्तरों का नाम क्रमशः सुना रहा हूँ, तुम शान्त और एकाग्रभाव से इसको सुनो ॥१८-१९॥ पहले स्वायम्भुव मनु उसके बाद और स्वारोचिष मनु हुए। उसके अनन्तर उत्तम, तामस, रैवत, चाक्षुष तथा वैवस्वत मनु हुए। सूर्यसावर्णि आठवें और नवें दक्षसावर्णि हैं जो सदा सब देवों के हित में लगे रहते हैं। दसवाँ ब्रह्म सावर्णि, ग्यारहवाँ धर्मसावर्णि, बारहवाँ रुद्रसावर्णि, तेरहवां मनु रोचमान और चौदहवाँ भौत्य मनु हैं। ये ही चौदह मनु कहे गए हैं। विबुधर्षभ ! अब देवों और इन्द्रों को बतला रहा हूँ, सुनो ॥२०-२३॥ स्वायम्भुव