बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 298, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रिचत्वारिंशोऽध्यायः २७६ ब्रह्म धारयतां नित्यं व्रतानि नियमांस्तथा । ब्रह्म चैव पुरा सृष्टं येन जानंति तद्विदः ॥६१॥ तेषां बहुविधास्त्वन्यास्तत्र तत्र द्विजातयः । पिशाचा राक्षसाः प्रेता विविधा म्लेच्छजातयः सा सृष्टिर्मानसी नाम धर्मतंत्रपरायणा ॥६२॥ भरद्वाज उवाच ब्राह्मणः केन भवति क्षत्रियो वा द्विजोत्तम । वैश्यः शूद्रश्च विप्रर्षे तद्ब्रूहि वदतां वर ॥६३॥ भृगुरुवाच जातकर्मोदिभिर्यस्तु संस्कारैः संस्कृतः शुचिः । वेदाध्ययनसंपन्नो ब्रह्मकर्मस्ववस्थितः ॥६४॥ शौचाचारस्थितः सम्यग्विद्याभ्यासी गुरुप्रियः । नित्यव्रती सत्यपरः स वै ब्राह्मण उच्यते ॥६५॥ सत्यं दानमथोद्रोह आनृशंस्यं कृपा घृणा । तपस्यां दृश्यते यत्र स ब्राह्मण इति स्मृतः ॥६६॥ क्षत्रजं सेवते कर्म वेदाध्ययनसंगतः । दानादानरतिर्यस्तु स वै क्षत्रिय उच्यते ॥६७॥ विशत्याशु पशुभ्यश्च कृष्यादानरतिः शुचिः । वेदाध्ययनसंपन्नः स वैश्य इति संज्ञितः ॥६८॥ सर्वभक्षरतिर्नित्यं सर्वकर्मकरोऽशुचिः । त्यक्तवेदस्त्वनाचारः स वै शूद्र इति स्मृतः ॥६९॥ शूद्रे चैतद्भवेल्लक्ष्म द्विजे तच्च न विद्यते । न वै शूद्रो भवेच्छूद्रो ब्राह्मणो ब्राह्मणो न च ॥७०॥ सर्वोपायैस्तु लोभस्य क्रोधस्य च विनिग्रहः । एतत्पवित्रं ज्ञानानां तथा चैवात्मसंयमः ॥७१॥ वर्ज्यौ सर्वात्मना तौ हि श्रेयोघातार्थमुद्यतौ । नित्यक्रोधाच्छ्रियं रक्षेत्तपो रक्षेत्तु मत्सरात् ॥७२॥ कभी नष्ट नहीं होती ॥६०॥ ब्रह्म (वेद ज्ञान) के धारण करने वाले उनके व्रत और नियम कभी भंग नहीं होते । पहले ब्रह्म की ही सृष्टि हुई, जिसका ज्ञान केवल वेदज्ञ ज्ञानियों को ही है ॥६१॥ उसी श्रेणी की अनेकों प्रकार की द्विजातियां यत्र-तत्र हैं । पिशाच-राक्षस, प्रेत और विविध म्लेच्छ जातियां भी इसी प्रकार द्विजाति से भ्रष्ट हैं । वह ब्राह्मण सृष्टि धर्म का ही अनुशासन मानने वाली मानसी सृष्टि है ॥६२॥ भरद्वाज बोले--द्विजोत्तम, किस कर्म से ब्राह्मण होते हैं, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों के कर्म क्या हैं, विप्रर्षे ! श्रेष्ठ वाग्मी ! इसको कहिए ॥६३॥ भृगु बोले-जो जाति कर्म आदि से और संस्कारों से संस्कृत और शुचि है, जो वेदाध्ययन में लगा रहता, ब्रह्मकर्म का पालन करता, पवित्र आचारों को ही अपनाता है, सर्वदा गुरु की सेवा में लीन रहकर भली भाँति विद्या का अभ्यास करता है, जो सत्य-परायण और नित्य प्रति व्रतों का अनुष्ठान करता है वही ब्राह्मण कहा जाता है ॥६४-६५॥ सत्य, दान, अद्रोह, कोमलता, कृपा, अघृणा और तपस्या जिस व्यक्ति में दिखाई दे उसको ब्राह्मण कहा जाता है ॥६६॥ जो क्षत्रियोचित कर्मों को वेदाध्ययनपूर्वक करते हैं, दान के लिए आदान (कर लेने) में जिसकी रुचि हो उसको क्षत्रिय कहते हैं ॥६७॥ जो पशुपालन और कृषि द्वारा जीवन-निर्वाह करता जिसकी दान में विशेष रुचि रहती और जो वेदाध्ययन किये हुए हो उसको वैश्य कहा जाता है ॥६८॥ भक्ष्याभक्ष्य का विचार न करने वाला, सब भले-बुरे कामों को करने वाला, अशुचि, वेद मर्यादा को न मानने वाला और आचारहीन शूद्र कहा जाता है ॥६९॥ शूद्र में ये सभी लक्षण होते हैं और द्विज में ये लक्षण नहीं होते हैं । यदि शूद्र में उक्त शूद्र के लक्षण न हों तो वह शूद्र नहीं है और ब्राह्मण में ब्राह्मण के लक्षण न हों तो वह ब्राह्मण नहीं है । सब उपायों से क्रोध और लोभ को वश में करना चाहिए । ज्ञानियों का यह पवित्र धर्म है, आत्मसंयम ही ज्ञानी का मुख्य कर्त्तव्य है ॥७०-७१॥ इन कल्याण के शत्रु क्रोध और लोभ को सर्वथा दूर रखना चाहिए । नित्य क्रोध से श्री की रक्षा और मात्सर्य से तप की रक्षा करनी चाहिए ॥७२॥ मान और अपमान