भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 358, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 358

[Header] पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३३६ [/Header]

अंतरस्वरसंयुक्तः काकलियंत दृश्यते । तं तु साधारितं विद्यात्पंचमस्थं तु कैशिकम् ॥५५॥ कैशिकम् भावयित्वा तु स्वरैः सर्वैः समंततः । यस्मात्तु मध्यमे न्यासस्तस्मात्कैशिकमध्यमः ॥५६॥ काकलिद्दृश्यते यत्र प्राधान्यं पंचमस्य तु । कश्यपः कैशिकं प्राह मध्यमग्रामसंभवम् ॥५७॥ गेति गेयं विदुः प्राज्ञा धेति कारुप्रवादनम् । वेति वाद्यस्य संज्ञेयं गंधर्वस्य परोचनम् ॥५८॥ यः सामगानां प्रथमः स वेणोर्मध्यमः स्वरः । यो द्वितीयः स गांधारस्तृतीयस्त्वृषभः स्मृतः ॥५९॥ चतुर्थः षड्ज इत्याहुः पंचमो धैवतो भवेत् । षष्ठो निषादो विज्ञेयः सप्तमः पंचमः स्मृतः ॥६०॥ षड्जं मयूरो वदति गावो रंभंति चर्षभम् । अजाविके तु गांधारं क्रौंचो वदति मध्यमम् ॥६१॥ पुष्पसाधारणे काले कोकिला वक्ति पञ्चमम् । अश्वस्तु धैवतं वक्ति निषादं वक्ति कुंजरः ॥६२॥ कंठादुत्तिष्ठते षड्जः शिरसस्त्वृषभः स्मृतः । गांधारस्त्वनुनासिक्य उरसो मध्यमः स्वरः ॥६३॥ उरसः शिरसः कंठादुत्थितः पंचमः स्वरः । ललाटाद्धैवतं विद्यान्निषादं सर्वसन्धिजम् ॥६४॥ नासा कंठमुरस्तालुजिह्वादन्तांश्च संश्रितः । षड्भ्यः संजायते यस्मात्तस्मात्षड्ज इति स्मृतः ॥६५॥ वायुः समुत्थितो नाभेः कंठशीर्षसमाहतः । नर्द्दर्द्यृषभमद्यस्मात्तस्मादृषभ उच्यते ॥६६॥ वायुः समुत्थितो नाभेः कंठशीर्षसमाहतः । वाति गंधवहः पुण्यो गांधारस्तेन हेतुना ॥६७॥ वायुः समुत्थितो नाभेह्रौ हृदि समाहतः । नाभिम्प्राप्तो मध्यवर्ती मध्यगत्वं समश्नुते ॥६८॥ वायुः समुत्थितो नाभेह्रोरूहृत्कंठकाहतः । पंचस्थानोत्थितस्यास्य पंचमत्वं विधीयते ॥६९॥

उसको साधारित समझना चाहिए, पंचमस्थ यदि काकलि हो तो उसको कैशिक कहा जाता है। जब कैशिक को चारों ओर से सब स्वरों से भावित कर मध्यम में न्यस्त किया जाता है तब उसको कैशिक मध्यम कहा जाता है ।।५५-५६।। जहाँ काकलि तो हो परन्तु पंचम की प्रधानता हो उसको कश्यप ने मध्यमग्राम से उत्पन्न कैशिक कहा है ।।५७।। विद्वान् पुरुष 'गा' का अर्थ गेय मानते हैं, 'ध' का अर्थ कलापूर्वक वाद्य बजाना कहते हैं और रेफसहित 'व' का अर्थ वाद्य सामग्री है। यही 'गान्धर्व' शब्द का लक्ष्यार्थ है ।।५८।। सामगायकों का जो प्रथम स्वर है वह वेणु का मध्यम स्वर है। जो उनका दूसरा है उसको गान्धार तथा उनके तीसरे को ऋषभ कहते हैं। चौथे को षड्ज और पाँचवें को धैवत कहते हैं। छठें को निषाद और सातवें को पंचम कहते है ।।५९-६०।। मयूर षड्ज में बोलता और गायें ऋषभ स्वर में बोलती हैं। भेड़-बकरियाँ गांधार स्वर में मिमियाती और क्रौंच मध्यम स्वर में कूजता है ।।६१।। साधारण रूप से जब वसन्त के आगमन काल में फूल खिलते हैं, उस समय कोकिला पंचम स्वर में कूकती है। अश्व धैवत स्वर में हिनहिनाता है और हाथी निषाद स्वर में चिंघाड़ता है ।।६२।। कण्ठ से षड्ज स्वर उठता ओर शिर से ऋषभ। गान्धार अनुनासिक से उत्पन्न होता और उरस् (छाती) से मध्यम स्वर निकलता है ।।६३।। उरस्, शिर और कण्ठ तीनों से पंचम स्वर निकलता है। ललाट से धैवत और सब सन्धियों से निषाद स्वर उत्पन्न होता है। ।।६४।। नासा, कण्ठ, उरस्, तालु, जिह्वा और दांत इन छह स्थानों से षड्ज स्वर निकलता है ।।६५।। नाभि से वायु ऊपर को उठता और कण्ठ से शिर से धक्का खाकर वह स्वर ऋषभ (बैल) के समान हुंकारता है इसलिए उसको ऋषभ स्वर कहते हैं ।।६६।। नाभि से वायु ऊपर उठकर जब कण्ठ और शिर से टकरा कर गंधवाही वायु के समान सन सनाता हुआ निकलता है तब उसको गांधार कहते हैं ।।६७।। नाभि सेवायु ऊपर उठकर ऊरु और हृदय से टकराकर नाभिस्थान में मध्यवर्ती होता है, अतः उससे निकले हुए स्वर को मध्यम कहा जाता है ।।६८।। नाभि से ऊपर उठा हुआ वायु जब ऊरु, हृदय, कण्ठ और शिर से टकराकर बाहर निकलता है तब पाँच स्थानों से निकलने वाले स्वर को पंचम

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