बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 415, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ें३६६ नारदीयपुराणम् भोग्यासून्नूनकस्याथ भुक्तासूनधिकस्य च । सपिंडचांतरलग्नासूनेवं स्यात्कालसाधनम् ॥१५०॥ विरावर्कभुजांशाश्चेत्छिद्राल्याः स्याद् ग्रहो विधोः । तेषां शिवघ्नाः शैलाप्ता व्यावार्कजः ॥१५१॥ शरोंगुलैः अर्कं विधुर्विधुं भूभा छादयत्यथ छन्नकम् । छाद्यछादकमानार्धं शरोनं ग्राह्यर्वाजतम् ॥१५२॥ तत्स्वच्छन्नं च मानैक्यार्द्धाच्छष्ठं दशाहतम् । छन्नघ्नमस्मान्मूलं तु स्वांगोनम्लौवपुहृतम् ॥१५३॥ स्थित्यर्द्ध घटिकादिस्याद्द्वच गन्ग्राह्य शसंमितैः । इष्टैः पलैस्तदूनाढ्यं व्यगावूनैऽर्कषड्गुणः ॥१५४॥ तदन्यथाधिके तस्मिन्नेवं स्पष्टे सुखांत्यगे । ग्रासेन स्वाहते च्छाद्यमानाभे स्युर्विशोपकाः ॥१५५॥ पूर्णान्त मध्यमत्र स्याद्दर्शातजं त्रिभोनकम् । पृथक्तत्क्रांत्यक्षभागसंस्कृतौ स्युर्नतांशाः ॥१५६॥ (लग्न और स्पष्ट सूर्य को जानकर इष्टकाल-साधन-लग्न और सूर्य इन दोनों में जो कम (पीछे) हो, उसके 'भोग्यांश' द्वारा 'भोग्यपल' और जो अधिक (आगे) हो उसके भुक्तांश द्वारा 'मुक्तपल' साधन कर दोनों को जोड़कर तथा उसमें उन दोनों (लग्न और सूर्य) के बीच में जो राशियाँ हों, उनके उदयासुओं को जोड़ने से 'इष्टकालासु' होते हैं ॥१५०॥ ग्रहण-साधन-पर्वान्त काल में स्पष्ट सूर्य, चन्द्र और राहु का साधन करना चाहिए। सूर्य में राहु को घटाकर जो शेष बचे, उसके भुजांश यदि १४ से अल्प हो तो चन्द्रग्रहण की संभावना समझे । उन भुजांशों को ११ से गुणाकर ७ से भाग देने पर लब्धि-अंक अंगुलादि 'शर' होता है ॥१५१॥ सूर्य को चन्द्रमा और चन्द्रमा को भूभा (पृथिवी की छाया) छादित करती है। इसलिए सूर्यग्रहण में सूर्य छाद्य और चन्द्रमा छादक तथा चन्द्रग्रहण में चन्द्रमा छाद्य, भूभा छादक (ग्रहणकर्त्री होती है। अब छन्न (ग्रास) मान कहते हैं- छाद्य और छादक के बिम्बमानों का योग करके उसके आधे में 'शर' घटाने से 'छन्न' (ग्रास) मान प्राप्त होता है। यदि ग्रासमान ग्राह्य (छाद्य) से अधिक हो तो उसमें छाद्य को घटानेपर जो शेष बचे, उतना खच्छन्न (खग्रास) समझना चाहिए। मानैक्यार्ध (छाद्य-छादक के बिम्बमानों के योग का आधा) में शर जोड़कर १० से गुणा करे। फिर ग्रासमान से गुणा करके गुणनफल के मूल में अपना षष्ठांश घटाकर शेष में चन्द्र-बिम्ब से भाग देने पर लब्धि-प्राप्त घटी आदि को स्थित्यर्ध जानना चाहिए। इस स्थित्यर्ध को दो स्थानों में रखे। व्यगु (व्यग्वर्क-राहु घटाया हुआ सूर्य) यदि ६ या १२ राशि से कम हो तो द्विगुणित व्यगु भुजांशतुल्य पल को प्रथम स्थानगत स्थित्यर्ध में घटाये और द्वितीय स्थान वाले में जोड़े। व्यगु भुजांशतुल्य पल को प्रथम स्थानगत स्थित्यर्ध में घटाना और द्वितीय स्थान वाले में जोड़ना चाहिए। यदि व्यगु ६ या १२ से अधिक हो तो विपरीत क्रम से (प्रथम स्थान में जोड़ने और द्वितीय स्थान में घटाने से) स्पर्श और मोक्षकालिक स्पष्ट स्थित्यर्ध होते हैं ॥१५२-१५४॥ (ग्रहण का विशोपक 'बिस्वा' फल)-अंगुलादि ग्रासमान को २० से गुणा करके गुणनफल में अंगुलात्मक छाद्यमान से भाग दे, इस प्रकार लब्धि विशोपक फल होता है ।।१५५॥ सूर्यग्रहण में विशेष लम्बन-घटो-साधन-पर्वान्त काल में ग्रहण का मध्य होता है। सूर्यग्रहण में दर्शान्त कालिक लग्न बनाकर उसमें तीन राशि घटाने से प्राप्त फल 'त्रिभ' या 'त्रिभोन' लग्न कहलाता है। उसको पृथक् रखकर उसको क्रान्ति और अक्षांश के संस्कार (एक दिशा में योग, भिन्न दिशा में अन्तर) करने से 'नतांश' प्राप्त होता है। उसका २२वां भाग करके वर्ग करना चाहिए। यदि २ कम हो तो उसी में, यदि २ से