बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंषट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४८१ तस्मिन्संग्रहदोषे तु विवाहं नैव कारयेत् । सूर्येण संयुते चंद्रे दारिद्र्यं भवति स्फुटम् ॥४५५॥ कुजेन मरणं व्याधिः सौम्येन त्वनपत्यता । दौर्भाग्यं गुरुणा युक्ते सापत्न्यं भार्गवेण तु ॥४५६॥ प्रव्रज्या सूर्यपुत्रेण राहुणा मूलसंक्षयः । केतुना संयुते चन्द्रे नित्यं कष्टं दरिद्रता ॥४५७॥ पापग्रहुते चन्द्रे दंपत्योर्मरणं भवेत् । शुभग्रहयुते चंद्रे स्वोच्चस्थे मित्रराशिगे ॥४५८॥ दोषायनं भवेल्लग्नं दंपत्योः श्रेयसे सदा । स्वोच्चगो वा स्वक्षंगो वा मित्रक्षेत्रगतोऽपि वा ॥४५८॥ पापग्रहयुतश्चन्द्रः करोति मरणं तयोः । दंपत्योरष्टमं लग्नमष्टमो राशिरैव च ॥४६०॥ यदि लग्नगतः सोऽपि दंपत्योर्मरणप्रदः । स राशिः शुभसंयुक्तो लग्नं वा शुभसंयुक्तम् ॥४६१॥ लग्नं विवर्जयेद्यस्मात्तद्वंशांशतदीशवराम् । दंपत्योर्द्वादशं लग्नं राशिर्वा यदि लग्नगः ॥४६२॥ अर्थहानिस्तयोरस्मात्तदंशस्वामिनं त्यजेत् । जन्मराश्युदयश्चैव जन्मलग्नोदयः शुभः ॥४६३॥ तयोरुपचयस्थानं लग्नेऽत्यंतशुभप्रदम् । खमार्गणा वेदपक्षाः खरामा वेदमार्गणाः ॥४६४॥ वह्निचंद्रा रूपदक्षाः खरामा व्योमबाहवः । द्विरामाः स्वान्नयः शून्यदक्षाः कुंजरक्ष्मयः ॥४६५॥ रूपपक्षा व्योमहक्षा वेदचंद्राश्चतुर्दश । शून्यचन्द्रा वेदचन्द्रा षड्व्रक्षा वेदबाहवः ॥४६६॥
बुध से युक्त हो तो अनपत्यता, गुरु से युक्त हो तो दौर्भाग्य, शुक्र से युक्त हो तो पत्नि-पत्नी में शत्रुता, शनि से युक्त हो तो प्रव्रज्या (गृहत्याग), राहु युक्त हो तो सर्वस्व हानि और केतु से युक्त हो तो कष्ट और दरिद्रता होती है ॥४५४-४५७॥ पापग्रह की निन्दा और शुभग्रहों की प्रशंसा-मुने ! इस प्रकार संग्रहदोष में चन्द्रमा यदि पापग्रह से युक्त हो तो वर-वधू दोनों के लिए घातक होता है। यदि वह शुभग्रहों से युक्त हो तो उस स्थिति में यदि उच्च या मित्र की राशि में चन्द्रमा हो तो लग्न दोषयुक्त रहने पर भी वरवधू के लिए कल्याणकारी होता है। परन्तु चन्द्रमा स्वोच्च में या स्वराशि में अथवा मित्र की राशि में रहने पर यदि पापग्रह से युक्त हो तो वरवधू दोनों के लिए घातक होता है ॥४५८-४५९॥ अष्टमराशि लग्नदोष--वर या वधू के जन्मलग्न से अथवा उनकी जन्मराशि से अष्टमराशि विवाह- लग्न में पड़े तो यह दोष भी वर-वधू के लिए घातक होता है। वह राशि या वह लग्न शुभग्रह से युक्त हो तो भी उस लग्न को, उस नवमांश से युक्त लग्न को अथवा उसके स्वामी को यत्नपूर्वक त्याग देना चाहिए ॥४६०-४६१३॥ द्वादश राशिदोष--वर-वधू के जन्म लग्न या जन्मराशि से द्वादश राशि यदि विवाहलग्न में पड़े तो वर-वधू के धन की हानि होती है। इसलिए उस लग्न को, उसके नवमांश को और उसके स्वामी को भी त्याग देना चाहिए ॥४६२३॥ जन्मलग्न और जन्म-राशि की प्रशंसा--जन्मराशि और जन्मलग्न का उदय विवाह में शुभ होता है तथा दोनों के उपचय (३, ६, १०, ११) स्थान यदि विवाह लग्न में हो तो अत्यन्त शुभप्रद होते हैं ॥ विषघटी ध्रुवाङ्क--अश्विनी का ध्रुवांक ५० भरणी का २४, कृत्तिका का ३०, रोहिणी का ५४, मृगशिरा का १३, आर्द्रा का २१, पुनर्वसु का ३०, पुष्य का २०, अश्लेषा का ३२, मघा का ३०, पूर्वा फाल्गुनी का २०, उत्तरा फाल्गुनी का १८, हस्त का २१, चित्रा का २०, स्वाती का १४, विशाखा का १४, उत्तराषाढ़ का २०, ६१ ना० पु०