बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंषट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४६१ विस्तार आयामगुणो गृहस्य पदमुच्यते । तस्माद्धनाधनायर्क्षवारांशाः संख्यया क्रमात् ॥५६३॥ धनाधिकं गृहं वृद्धयै ऋणाधिकमशोभनम् । विषमायः शुभायैव समायोधनाय निर्धनाय च ॥५६४॥ धनक्षयस्तृतीय पञ्चमर्क्षे परः क्षयः । आत्मक्षयः सप्तमोर्क्षे भवेत्येव हि भर्तृभात् ॥५६५॥ द्विर्द्वादशो निर्धनाय त्रिकोणमसुताय च । षट्काष्टकं मृत्यवे स्याच्छुभदा राशयः परे ॥५६६॥ सूर्याङ्गारकवारांशा वैश्वानरभयप्रदाः । इतरे ग्रहवारांशाः सर्वकामार्थसिद्धिदाः ॥५६७॥ नभस्यादिषु मासेषु त्रिषु त्रिषु यथाक्रमम् । पूर्वादिदक्शिरोवामपार्श्वशयायाप्रदक्षिणम् ॥५६८॥ चराह्वयो वास्तुपुमान् चरत्येवं महोदरः । यद्दिङ्मुखो वास्तुपुमान् कुर्यात्तद्दिङ्मुखं गृहम् ॥५६९॥ प्रतिकूलमुखं गेहं रोगशोकभयप्रदम् । सबलो मुखगेहानामेष दोषो न विद्यते ॥५७०॥ वृत्येटिकां स्वर्णरेणुधान्यशैवलसंयुक्तम् । गृहमध्ये हस्तमात्रे गर्ते न्यासाय विन्यसेत् ॥५७१॥ वस्त्वायामदलं नाभिस्तस्माद्व्यंगुलत्रयम् । कुक्षिस्तस्मिन्यसेच्छंकुं पुत्रपौत्रविवर्धनम् ॥५७२॥ चतुर्विंशत्रयोविंशत्षोडशद्वादशांगुलैः । विप्रादीनां कुक्षिमानं स्वर्णवस्त्राद्यलंकृतम् ॥५७३॥
वास्तुभूमि तथा घर के धन, ऋण, आय, नक्षत्र, वार, और अंश के ज्ञान का साधन - वास्तुभूमि या घर को चौड़ाई को लम्बाई से गुणा करने पर गुणनफल 'पद' कहलाता है । उस 'पद' को (६ स्थानों में रख कर क्रमशः ८,३,९,८,९,६ से गुणा करे और गुणनफल में क्रमशः १२,८,८,२७,७,९ से भाग दे । फिर जो शेष बचे वे क्रमशः धन, ऋण, आय, नक्षत्र, वार तथा अंश होते हैं। धन अधिक हो तो वह घर शुभ होता है । यदि ऋण अधिक हो तो अशुभ होता है तथा विषम (१,३,५,७) आय शुभ और सम (२,४,६,८) आय अशुभ होता है। घर का जो नक्षत्र हो, वहाँ से अपने नाम के नक्षत्र तक गिनकर जो संख्या हो, उसमें ९ से भाग दे । फिर यदि शेष (तारा) ३ बचे तो धन का नाश होता है । ५ बचे तो यश की हानि होती है और ७ बचे तो गृहकर्ता का ही मरण होता है। घर की राशि और अपनो गिनने पर परस्पर २,१२ हो तो धनहानि होती है; ९, ५ हो तो पुत्र की हानि होती है और ६,८ हो तो अनिष्ट होता है; अन्य संख्या हो तो शुभ समझना चाहिए । सूर्य और मंगल के वार तथा अंश हो तो उस घर में अग्निभय होता है। अन्य वार-अंश हो तो सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओं की सिद्धि होती है ॥५६३-५६७॥ वास्तु पुरुष की स्थिति-भादों आदि तीन-तीन मासों में क्रमशः पूर्व आदि दिशाओं की ओर मस्तक करके बायीं करवट से सोये हुए महासर्पस्वरूप 'घर' नामक वास्तु पुरुष प्रदक्षिण-क्रम से विचरण करते रहते हैं । जिस समय जिस दिशा में वास्तुपुरुष का मस्तक हो, उस समय उसी दिशा में घर का दरवाजा बनाना चाहिए, मुख से विपरीत दिशा में घर का दरवाजा बनाने से रोग, शोक और भय होते हैं। किन्तु यदि घर में चारो दिशाओं में द्वार हो तो यह दोष नहीं होता है ॥५६८-५७०॥ गृहारम्भकाल में नींव के भीतर हाथ भर के गड्ढे में स्थापित करने के लिए सोना, पवित्र स्थान की रेणु (धूलि), धान्य और सेवारसहित ईंट घर के भीतर संग्रह करके रखे । घर की जितनी लम्बाई हो, उसके तीन अंगुल नीचे (वास्तुपुरुष के पुच्छभाग की ओर) कुक्षि रहती है। उसमें शंकु का न्यास करने से पुत्र आदि की वृद्धि होती है ॥५७१-५७२॥ शंकु प्रमाण-खैर, अर्जुन, शाखू, कचनार, रक्तचन्दन, पलाश, रक्तशाल विशाल आदि वृक्षों में से किसी की लकड़ी से शंकु बनता है। ब्राह्मणादि वर्गों के लिए क्रमशः २४, २३, २० और १६ अंगुल के शंकु होने चाहिए।