भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 515

४९६ नारदीयपुराणम् मैत्रादितीन्द्रर्क्षा त्याश्विविहरितिव्यवसूडुषु । असप्तपञ्चद्वयाद्येषु यात्राभीष्टफलप्रदाः ॥६२३॥ न मंदेंदुदिने प्राचीं न व्रजेद्दक्षिणं गुरौ । सिताक॑योर्न प्रतीचीं नोदीचीं ज्ञारयोर्दिने ॥६२४॥ इंद्राजपादवम्ब्वगस्यार्यमक्षांणि पूर्वतः । शूलानि सर्वद्वाराणि मित्राकॅज्याश्वभानि च ॥६२५॥ क्रमाद्दिग्द्वारभानि स्युः सप्तसप्ताग्निधिष्ण्यतः । पुर्धिं लंघयेद्दंडं नाग्निश्वसनदिग्गमम् ॥६२६॥ आग्नेयं पूर्वादिग्धिष्ण्यैर्विदिशश्चैवमेव हि । दिग्दाशयस्तु क्रमशो मेषाद्याश्च पुनः पुनः ॥६२७॥ दिगीश्वरे ललाटस्थे यातुर्न पुनरागमः । लग्नस्थो भास्करः प्राच्यां दिशि यातुर्ललाटगः ॥६२८॥ द्वादशैकादशः शुक्रोऽप्याग्नेय्यां तु ललाटगः । दशमस्थः कुजो लग्नाद्याम्यां यातुर्ललाटगः ॥६२६॥ नवमाष्टमगो राहुनैर्ऋत्यां तु ललाटगः । लग्नात्सप्तमंगः सौरिः प्रतीच्यां तु ललाटगः ॥६३०॥ षष्ठः पञ्चमगाश्चन्द्रो वायव्यां च ललाटगः । चतुर्थस्थानगः सौम्यश्चोत्तरस्यां ललाटगः ॥६३१॥ द्वित्रिस्थानगतो जीव ईशान्यां वै ललाटगः । ललाटं तु परित्यज्य जीवितेच्छुव्रजेन्नरः ॥६३२॥ विहित नक्षत्र--अनुराधा, पुनर्वसु, मृगशिरा, हस्त, रेवती, अश्वनी, श्रवण, पुष्य और धनिष्ठा-इन नक्षत्रों में यदि अपने जन्म-नक्षत्र से सातवीं, पाँचवीं और तीसरी तारा न हो तो यात्रा अभीष्ट फल को देने वाली होती है ।।६२३।। दिशाशूल--शनि और सोमवार के दिन पूर्व दिशा की ओर नहीं जाना चाहिए । गुरुवार को दक्षिण नहीं जाना चाहिए । शुक्र और रविवार को पश्चिम नहीं जाना चाहिए । तथा बुध और मंगल को उत्तर दिशा यात्रा नहीं करना चाहिए । ।।६२४।। ज्येष्ठा, पूर्वभाद्रपद, रोहिणी और उत्तरा फाल्गुनी-ये नक्षत्र क्रमशः पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर दिशा में शूल होते हैं । सर्वदिग्गमन नक्षत्र-अनुराधा, हस्त, पुष्य और अश्विनी-ये चार नक्षत्र सब दिशाओं को यात्रा में प्रशस्त हैं ।।६२५।। दिग्द्वार-नक्षत्र- कृत्तिका से आरंभ करके सात-सात नक्षत्र-समूह पूर्वादि दिशाओं में रहते हैं। तथा अग्निकोण से वायुकोण तक परिघदण्ड रहता है; अतः इस प्रकार यात्रा करनी चाहिए, जिससे परिघदण्ड का लंघन न हो ।।६२६।। पूर्व के नक्षत्रों में अग्निकोण की यात्रा करे । इसी प्रकार दक्षिण के नक्षत्रों में अग्निकोण तथा पश्चिम और उत्तर के नक्षत्रों में वायुकोण की यात्रा कर सकते हैं । दिशाओं की राशियाँ- पूर्व आदि चार दिशाओं में मेष आदि १२ राशियाँ क्रमशः पुनः पुनः (तीन आवृत्ति से) आती हैं ।।६२७।। लालाटिक योग- जिस दिशा में यात्रा करनी हो, उस दिशा का स्वामी ललाटगत (सामने) हो तो यात्रा करने वाला लौटकर नहीं आता है। पूर्व दिशा में यात्रा करने वाले को लग्न में यदि सूर्य हो तो वह ललाटगत माना जाता है। यदि शुक्र लग्न से ग्यारहवें या बारहवें स्थान में हो तो अग्निकोण में यात्रा करने से, मगंल दशम भाव में हो तो दक्षिण यात्रा करने से, राहु नवें और आठवें भाग में हो तो नैऋत्यकोण की यात्रा से, शनि सप्तम भाव में हो तो पश्चिम-यात्रा से, चन्द्रमा पाँचवें और छठे भाव में हो तो वायुकोण की यात्रा से, बुध चतुर्थ भाव में हो तो उत्तर को यात्रा से, गुरु तीसरे और दूसरे भाव में हो तो ईशानकोण की यात्रा करने से ललाटगत होते हैं। जीवन की इच्छा रखने वाले मनुष्य इस ललाटयोग को त्यागकर यात्रा करे ।।६२८-६३२।।