भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 517

४६८ नारदीयपुराणम् जन्मोदये जन्मभे वा तयोरीशस्य भेऽपि वा । ताभ्यां तयोरिकेंद्रेषु यातुः शत्रुक्षयो भवेत् ॥६४३॥ शीर्षोदये लग्नगते द्विर्लग्ने लग्नगेऽपि वा । शुभवर्गोऽथ वा लग्ने यातुः शत्रुक्षयस्तदा ॥६४४॥ शत्रुजन्मोदये जन्मराशेर्वा निधनोदये । तयोरीशस्थिते राशौ यातुः शत्रुक्षयो भवेत् ॥६४५॥ वक्रः पन्था मीनलगने यातुमीनांशकेऽपि वा । निंद्यो निखिलयात्रासु घटलग्नो घटांशकः ॥६४६॥ जललग्नो जलांशो वा जलयोनेः शुभावहः । मूर्तिः कोशो धन्विन्वश्च वाहनं मंतसंज्ञकम् ॥६४७॥ शत्रुमार्गस्तथायुश्च मनोव्यापारसंज्ञिकम् । प्राप्तिरप्राप्तिरुदयाद्भावाः स्युर्द्वादशैव ते ॥६४८॥ घ्नंति क्रूरास्त्वयाप्तिवर्गं भावान्सूर्यमहीसुतौ । न निधनतो हि व्यापारं सौम्याः पुष्णंत्यर्रि विना ॥६४९॥ शुक्रोऽस्तं च न पुष्णाति मूर्ति मृत्युं च चंद्रमाः । याम्यदिग्गमनं त्यक्त्वा सर्वकाष्ठासु यायिनाम् ॥६५०॥ यदि यात्रालग्न में जन्मलग्न, जन्मराशि या इन दोनों के स्वामी हों अथवा जन्मलग्न या जन्मराशि से ३,६,११,१०वीं राशि हो तो शत्रुओं का नाश होता है ॥६४३॥ यदि शीर्षोदय (मिथुन, सिंह, कन्या, तुला, कुम्भ) तथा दिग्द्वार (यात्रा की दिशा) की राशि लग्न में हो अथवा किसी भी लग्न में शुभग्रह के वर्ग (राशि-होरादि) हों तो यात्रा करने वाले राजा के शत्रुओं का नाश होता है ॥६४४॥ शत्रु के जन्मलग्न या जन्मराशि से अष्टम राशि या उन दोनों के स्वामी जिस राशि में हों, वह राशि यात्रालग्न में हो तो शत्रु का नाश होता है । मीन लग्न में या लग्नगत मीन के नवमांश में यात्रा करने से मार्ग टेढ़ा हो जाता है (अर्थात् बहुत घूमना पड़ता है) तथा कुम्भलग्न और लग्नगत कुम्भ का नवमांश भी यात्रा में अत्यन्त निन्दित है ॥६४६॥ जलचर राशि (कर्क, मीन) या जलचर राशि का नवमांश लग्न में हो तो नौका द्वारा नदी-नद आदि मार्ग से यात्रा शुभ होती है ॥६४६॥ लग्नभावों की संज्ञा—१ मूर्ति (तन), २ कोष (धन), ३धन्वी (पराक्रम, भ्राता), ४ वाहन (सवारी, माता), ५ मंत्र (विद्या, सन्तान), ६ शत्रु (रोग, मामा), ७ मार्ग (यात्रा, पति-पत्नी), ८ आयु (मृत्यु), ९ मन (अन्तःकरण, भाग्य), १० व्यापार (व्यवसाय, पिता), ११ प्राप्ति (लाभ), १२ अप्राप्ति (व्यय)-ये क्रम से लग्न आदि १२ स्थानों की संज्ञायें हैं ॥६४७-६४८॥ पापग्रह (शनि, रवि, मंगल, राहु तथा केतु तीसरे और ग्यारहवें को छोड़कर अन्य सब भावों में जाने से भावफल को नष्ट कर देते हैं। तीसरे और ग्यारहवें भाव में जाने से वे इन दोनों भावों को पुष्ट करते हैं। सूर्य और मंगल ये दोनों दशम भाव को भी नष्ट नहीं करते, अपितु दशम भाव में जाने से उस भावफल (व्यापार, पिता, राज्य तथा कर्म) को पुष्ट ही करते हैं और शुभग्रह (चन्द्र, बुध, गुरु तथा शुक्र) जिस भाव में जाते हैं, उस भावफल को पुष्ट ही करते हैं; केवल षष्ठ (६) भाव में जाने से उस भावफल (शत्रु और रोग) को नष्ट करते हैं ॥६४९॥ शुभ ग्रहों में शुक्र सप्तम भाव को और चन्द्रमा लग्न एवं अष्टम (१,८) को पुष्ट नहीं करते हैं (अपितु नष्ट ही करते हैं) । अभिजित्-प्रशंसा-अभिजित् मुहूर्त (दिन का मध्यकाल - १२ बजे से १ घड़ी आगे और १ घड़ी पीछे) अभीष्ट फल सिद्ध करने वाला योग है। यह दक्षिण दिशा की यात्रा छोड़कर अन्य दिशाओं की यात्रा में