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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 536, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 536

अथैकोनषष्टितमोऽध्यायः सनंदन उवाच ततः स राजा सहितो मन्त्रिभिर्द्विजसत्तम । पुरः पुरोहितं कृत्वा सर्वाण्यंतःपुराणि च ॥१॥ शिरसा चार्घ्यमादाय गुरुपुत्रं समभ्यगात् । महदासनमादाय सर्वरत्नविभूषितम् ॥२॥ प्रददौ गुरुपुत्राय शुकाय परमोचितम् । तत्रोपविष्टं तं कार्ष्णं शास्त्रदृष्टेन कर्मणा ॥३॥ पाद्यं निवेद्य प्रथमं सार्घ्यं तां च न्यवेदयत् । स च तां मंत्रतः पूजां प्रतिगृह्य द्विजोत्तमः ॥४॥ पर्यपृच्छन्महातेजाराज्ञः कुशलमव्ययम् । उदारसत्त्वाभिजानो राजापि गुरुसूनवे ॥५॥ आवेद्य कुशलं भूमौ निषसाद तदाज्ञया । सोऽपि वैयासकिं भूयः पृष्ट्वा कुशलमव्ययम् किमागमनमित्येव पर्यपृच्छद्विधानवित् ॥६॥ शुक उवाच पिताहमुक्तो भद्रं ते मोक्षधर्मार्थकोविदः । विदेहराजोह्याद्यो मे जनको नाम विश्रुतः ॥७॥ तत्र त्वं गच्छ तूर्णं वै स ते हृदयसंशयम् । प्रवृत्तौ च निवृत्तौ सर्वं छेत्स्यत्यसंशयम् ॥८॥ सोऽहं पितुर्नियोगात्वामुपप्रष्टुमिहागतः । तन्मे धर्मभृतां श्रेष्ठ यथावद्वक्तुमर्हसि ॥६॥ किं कार्यं ब्राह्मणेनेह मोक्षार्थश्च किमात्मकः । कथं च मोक्षः कर्तव्यो ज्ञानेन तपसापि वा ॥१०॥ अध्याय ५६ अध्यात्मतत्त्व का निरूपण सनन्दन बोले-द्विजवर्य ! इतनी परीक्षा के बाद राजा मन्त्रियों के सहित पुरोहित और अपनी रानी एवं दासियों को आगे कर विनीत भाव से अर्घ्यपात्र लेकर गुरुपुत्र शुक के समीप आये और उन्होंने सब रत्नों से जड़े हुए उपयुक्त बहुमूल्य आसन गुरु-पुत्र शुक को अर्पित किया ॥१-२१/२॥ जब व्यासपुत्र आसनस्थ हो गए तब मिथिलाधीश ने शास्त्र विधि से उनको पाद्य और अर्घ्य आदि प्रदान कर गो-दान दिया ॥३१/२॥ उस महातेजस्वी द्विजवर ने भी मन्त्रपाठपूर्वक उस सत्कार को स्वीकार किया और राजा से कुशल-मंगल पूछा । उदार हृदय राजा भी गुरु-पुत्र से अपना सारा कुशल समाचार कहकर उनकी आज्ञा से पृथ्वी पर बैठ गया । उस विधिज्ञ राजा ने भी व्यास-पुत्र शुक से कुशल वार्ता पूछने के बाद पूछा कि आपने किस लिए यहाँ तक आने का कष्ट किया है ॥४-६॥ शुक ने कहा-पिताजी ने मुझसे कहा कि तुम्हारा कल्याण इसी में है कि तुम शीघ्र धर्म, अर्थ और मोक्ष के ज्ञाता जनक के समीप जाओ, जो मेरे प्रथम शिष्य हैं । वे ही तुम्हारे सब सन्देहों को दूर कर देगें । निश्चय ही वे तुम्हारे प्रवृत्ति और निवृत्ति विषयक सन्देहों को दूर कर देगें ॥७-८॥ इसी लिए मैं पिता की आज्ञा से आपके समीप अपनी शंकाओं को मिटाने के लिए आया हूँ। इसलिए हे धार्मिकों में श्रेष्ठ ! आप भली भाँति मुझे बतायें कि ब्राह्मणों को क्या करना चाहिए, मोक्ष का अभिप्राय क्या है, मोक्ष की प्राप्ति ज्ञान या तपस्या किससे होगी ? ॥६-१०॥

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