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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 571, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 571

५५२ नारदीयपुराणम् दार्णो यस्य मनोर्मध्ये मूर्ध्नि क्रोधयुगं तथा । अस्त्रं चास्ति स मन्त्रस्तु तिरस्कृत उदीरितः ॥३३॥ म्योद्वयं हृदयं शीर्षे वषड्वौषट्कमध्यमः । यस्य स्याद्भेदितो मन्त्रस्त्याज्यः क्लिष्टफलप्रदः ॥३४॥ व्यक्षरो हंसहीनो यः सुषुप्तः कीर्तितस्तु सः । विद्या वाप्यथवा मंत्रो भवेत्सप्तदशाक्षरः ॥३५॥ षट्कारपंचकादिर्यो मदोन्मत्तस्तु स स्मृतः । यस्य मध्ये स्थितं चास्त्रं स मंत्रो मूर्च्छितः स्मृतः ॥३६॥ विरामस्थानगं चास्त्रं हतवीर्यः स उच्यते । मंत्रस्यादौ च मध्ये च मूर्ध्नि चास्त्रचतुष्टयम् ॥३७॥ ज्ञातव्यो भ्रांत इत्येष यः स्यादष्टादशाक्षरः । पुनर्विंशतिवर्णो वा यो मंत्रः स्मरसंयुतः ॥३८॥ हृल्लेखांकुशबीजाद्यः प्रध्वस्तः स तु कथ्यते । सप्ताणो बालमंत्रस्तु कुमारो वसुवर्णवान् ॥३६॥ षोडशार्णो युवा प्रौढश्चतुर्विंशतिवर्णकः । त्रिंशद्वर्णश्चतुःषष्टिवर्णश्चापि शताक्षरः ॥४०॥ चतुःशताक्षरो मंत्रो वृद्ध इत्यभिधीयते । नवार्णस्तार संयुक्तो मंत्रो निस्त्रिंश उच्यते ॥४१॥ यस्यांते हृदयं प्रोक्तं शिरोमंत्रोऽथ मध्यगः । शिखा वर्म च यस्यांते नेत्रमस्त्रं च दृश्यते ॥४२॥ शिवशक्त्यार्णहीनो वै निर्बीजः स मनुः स्मृतः । आद्यंतमध्ये फट्कारः षोढा यस्मिन्प्रदृश्यते ॥४३॥ स मनुः सिद्धिहीनः स्यान्मंदः पंक्त्यक्षरो मनुः । कूट एकाक्षरो मंत्रः स एवोक्तो निरंशकः ॥४४॥ द्विवर्णःसत्त्वहीनः स्यात्केकरश्चतुरक्षरः । षड्वर्णो बीजहीनो वा सार्द्धसप्ताक्षरोऽपि वा ॥४५॥ सार्द्धद्वादशवर्णो वा धूमितो निंदितस्तु सः । सार्द्धबोजत्रययुतो मंत्रो विशतिवर्णवान् ॥४६॥ त्रिंशद्वर्णश्चैकविशद्वर्णश्चालिंगितस्तु सः । यो मंत्रो दंतवर्णस्तु मोहित सः तु कीर्तितः ॥४७॥ द वर्ण हो और अन्त में दो क्रोध (हुं हुं) बीज हों और उनके साथ अस्त्र (फट्) भी हो तो उसको तिरस्कृत कहते हैं। जिस मन्त्र के अन्त में म और य तथा हृदय हो और मध्य में वषट् और वौषट् हो उसको भेदित कहते हैं और वह कष्ट से सिद्धिदायक होता है उसका सर्वथा त्याग करना चाहिये ॥३३-३४॥ जो तीन अक्षरों का हो और हंस हीन हो उसको सुषुप्त कहते हैं। जो विद्या अथवा मन्त्र सत्रह अक्षर वाला हो और उसके आदि में पाँच बार फट् का प्रयोग हुआ हो, उसे मदोन्मत्त कहते हैं ॥३५½॥ जिसके मध्य में फट् हो उसको मूर्च्छित कहते हैं। जिसके विराम स्थान में अस्त्र (फट्) हो उसको हतवीर्य कहते हैं ॥३६½॥ जिस मन्त्र के आदि, मध्य और अन्त में चार अस्त्र (फट्) हों उसको भ्रान्त कहते हैं। जो मन्त्र अठारह या बीस वर्ण वाला हो कामबीज (क्लीं) से युक्त होकर हृदय, लेख और अंकुश के भी बीज से परिपूर्ण हो उसको प्रध्वस्त कहते हैं ॥३७½॥ सात वर्णों वाला मन्त्र बालमन्त्र और आठ वर्ण वाला कुमार है। सोलह वर्ण वाला युवा और चौबीस वर्ण वाला प्रौढ है। तीस, चौंसठ, सौ और चार सौ अक्षरों वाले मन्त्र वृद्ध कहे गये हैं ॥३९-४०½॥ नव वर्ण और तार (प्रणव) संयुक्त मन्त्र को निस्त्रिंश कहते हैं। जिनके अन्त में हृदय (नमः) हो, मध्य में शिरोमन्त्र (स्वाहा) हो और अन्त में शिखा (वषट्), कवच (हुं), नेत्र (वौषट्) और अस्त्र (फट्) हों तथा जो शिव एवं शक्ति अक्षरों से हीन हो, उसे निर्बीज कहा जाता है ॥४१-४२½॥ जिस मन्त्र के आदि, अन्त और मध्य में छःबार फट् हों वह मन्त्र सिद्धिहीन है। पाँच अक्षर वाला मन्त्र मंद और एक अक्षर वाला कूट है। उसी को निरंशक भी कहते हैं ॥४३-४४॥ दो वर्ण वाले को सत्त्वहीन, और चार अक्षर वाले को केकर कहते हैं। छः या साढ़े सात वर्ण वाला बीजहीन और साढ़े बारह अक्षर वाला धूमित माना गया है। वह निंदित है। जो साढ़े तीन बीज से युक्त, बीस वर्णों वाला, तीस और इक्कीस वर्णों वाला हो उसको आलिङ्गित कहा जाता है ॥४५-४६½॥ जो मन्त्र दन्त्य वर्ण वाला होता है उसको