बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टषष्टितमोऽध्यायः ५८५ श्रियं श्रियः पतिं चैव गौरीं गौरीपति तथा । रतिं रतिपतिं पश्चान्महीपूर्वं च पोत्रिणम् ॥२५॥ क्रमाद्विल्ववटाश्वत्थप्रियंगूनामधोऽर्चयेत् । रमा पद्मद्वयकरा शंखचक्रधरो हरिः ॥२६॥ गौरीपाशांकुशधरा टंकशूलधरो हरः । रतिः पद्मकरा पुष्पबाणचापधरः स्मरः ॥२७॥ शूकव्रीह्यग्रहस्ता भूः पोत्री चक्रगदाधरः । देवाग्रे पूजयेल्लक्ष्मीसहितं तु विनायकम् ॥२८॥ पूजयेत्षट्सु कोणेषु ह्यामोदाद्यान्प्रियायुतान् । आमोदं सिद्धिसंयुक्तमग्रतः परिपूजयेत् ॥२९॥ प्रमोदं चाग्निकोणे तु समृद्धिसहितं यजेत् । ईशकोणे यजेत्कीर्तिसंयुतं सुमुखं तथा ॥३०॥ वारुणे मदनावत्या संयुतं दुर्मुखं यजेत् । यजेन्नैर्ऋत्यकोणे तु विघ्नं मदद्रवायुतम् ॥३१॥ द्राविण्या विघ्नकर्तारं वायुकोणे समर्चयेत् । पाशांकुशाभयकरांस्तरुणाकंसमप्रभान् ॥३२॥ कपोलविगलद्दानगंधलुब्धालिशोभितान् । षट्कोणोभयपार्श्वे तु शंखपद्मनिधी क्रमात् ॥३३॥ सहितौ निजशक्तिभ्यां ध्यात्वा पूर्ववदर्चयेत् । केशरेषु षडंगानि पत्रेष्वष्टौ तु मातरः ॥३४॥ इन्द्राद्यानपि वज्रादीन्पूजयेद्धरणीगृहे । एवमाराध्य विघ्नेशं साधयेत्स्वमनोरथान् ॥३५॥ चतुश्चत्वारिंशताढ्यं चतुःशतमर्तन्द्रितः । तर्पयेदंबुभिः शुद्धैर्गजास्यं दिनशः सुधीः ॥३६॥ पद्मस्तु वशयेद्भूपांस्तत्पत्नीश्चोत्पलैस्तथा । कुमुदैर्मन्त्रिणोऽश्वत्थसमिद्भिर्वाडवाञ्शुभैः ॥३७॥ उदुम्बरोत्थैर्नृपतीन्वेश्यान्प्लक्षसमुद्भवैः । वटोद्भवैः समिद्भिश्च वशयेदंतिमान्बुधः ॥३८॥ आज्येन श्रियमाप्नोति स्वर्णाप्तिर्मधुना भवेत् । गोदुग्धेन गवां लाभो दध्ना सर्वसमृद्धिमान् ॥३६॥ के साथ वराहावतार की पूजा करे । नीचे बिल्व, वट, अश्वत्थ तथा प्रियंगु वृक्षों की पूजा करे ॥२२-२५१/२॥ (उस समय वहाँ के देवों का इस प्रकार ध्यान करे कि) लक्ष्मी के दोनों हाथों में कमल है । विष्णु शंख और चक्र धारण किये हुए हैं । गौरी के हाथों में पाश और अंकुश हैं । शंकर के हाथों में टंक एवं त्रिशूल हैं । रति के हाथ में कमल है । कामदेव के हाथ में पुष्प बाण तथा धनुष है । पृथ्वी के हाथ के अग्रभाग में अनाज की बाल है और वराहावतार के हाथों में चक्र एवं गदा हैं । देवों के आगे लक्ष्मी सहित गणेश का पूजन करे ॥२६-२८॥ फिर छह कोणों में प्रियासहित आमोद आदि दिग्गजों की पूजा करनी चाहिए । सिद्धि के साथ आमोद की पूजा आगे करे । अग्निकोण में समृद्धि के साथ प्रमोद का पूजन करे । ईशान कोण में कीर्ति के साथ सुमुख का, वायव्यकोण में मद- नावती के साथ दुर्मुख का, नैऋत्यकोण में मदद्रवा के साथ विघ्न का और वायुकोण में द्राविणी के साथ विघ्नकर्ता का पूजन करे ॥२९-३११/२॥ पूजन के समय ऐसा ध्यान करे कि इनके करों में पाश, अंकुश तथा अभय नामक अस्त्र हैं । इनकी कान्ति मध्याह्नकालीन सूर्य के समान है । और इनके गंडस्थल झरते हुए मद की गंध के लोभी भौरों से सुशोभित हैं । षट्कोणके दोनों बगल अपनी शक्तियों सहित शंख तथा पद्म का क्रमशः ध्यान करके पूर्ववत् उनकी अर्चना करे ॥३२-३३१/२॥ केसरो पर छहों अंगों, पत्तों पर आठ माताओं, इन्द्र आदि देवों और वज्र आदि आयुधों को भू-गृह में पूजा करे । इस प्रकार विघ्नराज की आराधना करके साधक अपनी कामनाओं को पूर्ण करे । सुधी साधक निरालस्य होकर चार सौ चौवालीस बार शुद्ध जल से गणेश-तर्पण करे । अनन्तर गणेश-मन्त्र की सिद्धि हो जाने पर मनुष्य कमलों से (हवनकर) राजा को, नीलकमलों से (हवन कर) राज-पत्नियों को, कुमुदों से (हवनकर) मंत्रियों को, पवित्र अश्वत्थ को समिधाओं से (हवनकर) ब्राह्मणों को, गूलर की लकड़ियों से (हवनकर) क्षत्रियों को, पाकड़ की लकड़ियों से (हवनकर) वैश्यों को और वट की लकड़ियों से (हवनकर) शूद्रों को वश में ला सकता है ॥३४-३८॥ वह घो से हवनकर लक्ष्मी, मधु से हवनकर सुवर्ण, गोदुग्ध से हवनकर गो और ७४ ना० पु०